स्वयंभू

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स्वयंभू को जैन परंपरा का प्रथम कवि माना जाता है।

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स्वयंभू की सम्पूर्ण रचनाएँ

आदिकाल के प्रमुख कवि स्वयंभू अपभ्रंश भाषा के कवि हैं।


जीवन परिचय

पिता: मारुत देव (वे स्वयं भी कवि थे)
माता: पद्मिनी



रचनात्मक परिचय

स्वयंभू को अपभ्रंश का सर्वश्रेष्ठ कवि और ‘अपभ्रंश का वाल्मीकि तथा व्यास’ कहा जाता है। वे जैन परंपरा के पहले कवि माने जाते हैं।
इनकी रचनाओं ने प्राकृत काव्य-धारा और मध्यकालीन हिंदी काव्य-धारा के बीच एक मजबूत कड़ी का काम किया।
इनकी रचनाओं में प्रबंध-कौशल, प्रकृति चित्रण, भक्ति की तन्मयता और सरसता का अद्भुत समन्वय है। इनके संवाद व्यंग्यपूर्ण और उक्तियाँ रसभरी होती हैं।

प्रमुख रचनाएँ (उपलब्ध):

पउम चरिउ (पद्मचरित): इसमें जैन परंपरा के अनुसार राम कथा का वर्णन है। यह उनका सबसे महत्वपूर्ण महाकाव्य है, जिसे उनके पुत्र त्रिभुवन स्वयंभू ने पूरा किया था।
रिट्ठणेमि चरिउ (अरिष्ट नेमिचरित/हरिवंश पुराण): इसमें कृष्ण लीला और महाभारत से जुड़ी कथाएँ हैं।
स्वयंभू छंदस्: यह प्राकृत-अपभ्रंश के छंदशास्त्र से संबंधित है।

स्वयंभू की कविताएं

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