
सरहपा हिंदी के प्रथम कवि माने जाते हैं (राहुल सांकृत्यायन के अनुसार) और उनकी प्रसिद्ध रचना ‘दोहाकोश’ है, जिसमें उन्होंने बाह्याडंबरों का खंडन करते हुए सहज साधना पर बल दिया है।
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परिचय
कविता
सरहपा की सम्पूर्ण रचनाएँ
सरहपा (सरहपाद) का जीवन परिचय
नाम: सरहपा, जिन्हें सरहपाद भी कहा जाता है।
अन्य नाम: राहुलभद्र, सरोजवज्र, शरोरुहवज्र, पद्मवज्र।
समयकाल (जन्म): राहुल सांकृत्यायन के अनुसार, इनका समय आठवीं शताब्दी (लगभग 769 ईस्वी) स्थिर किया गया है, जो हिंदी साहित्य जगत में सर्वमान्य है। ये पाल शासक धर्मपाल (770-810 ईस्वी) के समकालीन थे।
जन्म स्थान: विद्वानों में मतभेद है, लेकिन ये पूर्वी प्रदेश के किसी ‘राज्ञी’ नामक गाँव/नगरी के निवासी माने जाते हैं। कुछ विद्वान इसका अनुमान भागलपुर (बिहार) या पुंड्रवद्र्धन प्रदेश से लगाते हैं।
जाति: ये जाति से ब्राह्मण थे और शास्त्रों में निपुण थे।
कर्मभूमि: ये अपने समय के प्रसिद्ध ज्ञान केंद्र नालंदा विश्वविद्यालय (पटना के पास) से जुड़े रहे थे।
सिद्ध परंपरा: ये भारत के 84 सिद्धों में से एक माने जाते हैं और इन्हें आदि सिद्ध (प्रथम सिद्ध) का स्थान प्राप्त है।
साहित्यिक और धार्मिक योगदान
प्रथम कवि: राहुल सांकृत्यायन सहित अनेक विद्वान इन्हें हिंदी का प्रथम कवि मानते हैं। उड़िया और अंगिका के भी आदि कवि माने जाते हैं।
पंथ के प्रवर्तक: इनको बौद्ध धर्म की वज्रयान और सहजयान शाखा का प्रवर्तक माना जाता है।
वैचारिक दृष्टिकोण:
ये तत्कालीन ब्राह्मणवादी वैदिक विचारधारा, जातिभेद और कर्मकांडों के घोर विरोधी थे।
इन्होंने सहज मानवीय व्यवस्था और समतामूलक समाज का पक्ष लिया।
इनकी रचनाओं में साधना, सहज जीवन और रहस्यवाद का पुट मिलता है।
प्रमुख रचनाएँ
सरहपा के 32 ग्रंथों की चर्चा की जाती है।
इनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना “दोहाकोश” है, जिसका संपादन डॉ. प्रबोधचंद्र बागची और राहुल सांकृत्यायन ने किया है।
इनके कुछ पद हरप्रसाद शास्त्री द्वारा संपादित ‘बौद्धगान ओ दोहा’ में भी संकलित हैं।
इन्होंने दोहा, चर्यागीत और वज्रगीत शैलियों में रचनाएँ की हैं।
इनकी भाषा में अपभ्रंश का प्रभाव होते हुए भी हिंदी (पुरानी हिंदी) का बीज रूप स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
बच्चन सिंह ने लिखा है “आक्रोश की भाषा का पहला प्रयोग सरहपा में ही दिखाई देता है”
सरहपा की कविताएं
