‘दोहाकोश’ हिंदी साहित्य के आदिकाल में सिद्ध साहित्य के अंतर्गत आता है। यह ग्रंथ कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है:
रचनाकार: इसके रचयिता सरहपा हैं, जिन्हें महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी का प्रथम कवि माना है।
स्वरूप: यह दोहों (दोहा छंद) और पदों का संग्रह है। इसमें दोहा-चौपाई छंद का सबसे पहला प्रयोग देखने को मिलता है।
भाषा: इसकी भाषा अपभ्रंश और पुरानी हिन्दी का मेल है, जिसे विद्वानों ने ‘संधाभाषा’ या ‘संध्याभाषा’ भी कहा है।
संपादन: इस कृति को तिब्बत से लाकर राहुल सांकृत्यायन ने संपादित किया था, जिससे हिंदी साहित्य के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ा।
प्रमुख विषय-वस्तु और दर्शन
‘दोहाकोश’ की विषय-वस्तु बौद्ध धर्म की वज्रयान और सहजयान शाखा पर आधारित है, जिसका सार निम्न बिंदुओं में देखा जा सकता है:
पाखंड का खंडन: सरहपा ने हिंदू और बौद्ध दोनों ही धर्मों के बाह्याचारों, पूजा-पाठ, तीर्थ यात्रा, व्रत-उपवास, माला जपने और कर्मकांडों का तीव्र विरोध किया है।
सहज साधना पर बल: उन्होंने आडंबरों को छोड़कर सहज मार्ग से सत्य की प्राप्ति पर बल दिया है। उनके अनुसार, सत्य कहीं बाहर नहीं, बल्कि मनुष्य के अपने भीतर ही निवास करता है।
गुरु का महत्व: सहज मार्ग पर चलने के लिए सच्चे गुरु के मार्गदर्शन को अत्यंत आवश्यक बताया गया है।
जाति-भेद का विरोध: सिद्धों ने समाज में व्याप्त जाति-पाति के भेदभाव और रूढ़ियों का कड़ा विरोध किया।
सरहपा के ये विचार और खंडन की शैली आगे चलकर कबीर जैसे निर्गुण संत कवियों की रचनाओं में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, इसलिए उन्हें निर्गुण भक्ति की परंपरा का एक प्रारंभिक स्रोत भी माना जाता है।
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