
सिद्ध शबरपा आदिकाल के चौरासी सिद्धों में से एक प्रमुख कवि थे, जो सरहपा के शिष्य और ‘चर्यापद’ नामक प्रसिद्ध गेय पदों के रचयिता थे।
समस्त
परिचय
कविता
शबरपा की सम्पूर्ण रचनाएँ
सिद्ध शबरपा का जीवन परिचय
सिद्ध शबरपा आदिकाल की सिद्ध साहित्य परंपरा के एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कवि थे। इन्हें चौरासी सिद्धों में गिना जाता है और इनका समय लगभग 780 ईस्वी माना जाता है। इनका जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ था। शबरपा, सिद्ध सरहपा के शिष्य थे, जो हिंदी के प्रथम कवि माने जाते हैं। उन्होंने अपने गुरु से बौद्ध धर्म के सहजयान और वज्रयान मत की दीक्षा प्राप्त की थी।
शबरपा का नाम उनके रहन-सहन के ढंग के कारण पड़ा। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने अपना जीवन शबरों (एक प्रकार की वन्य या आदिवासी जाति) के समान व्यतीत किया, जिसके कारण वे शबरपा के नाम से प्रसिद्ध हुए। उनकी साधना पद्धति में माया-मोह का त्याग और सहज जीवन पर विशेष बल दिया गया है। वे बाह्य आडंबरों, जातिवाद और कर्मकांडों की निंदा करते थे और मानते थे कि मोक्ष या महासुख का मार्ग मनुष्य के भीतर ही विद्यमान है, जिसे गुरु के मार्गदर्शन और सहज साधना से प्राप्त किया जा सकता है।
शबरपा की सबसे प्रसिद्ध और उपलब्ध रचना ‘चर्यापद’ है। ये रचनाएँ गेय पदों के रूप में हैं, जिन्हें चर्यागीत भी कहा जाता है। इनकी भाषा पर अपभ्रंश मिश्रित पुरानी हिंदी का प्रभाव है और ये प्रायः संध्या भाषा में रचित हैं। संध्या भाषा का अर्थ है एक ऐसी रहस्यमयी भाषा, जिसमें दोहरा अर्थ निहित होता है: एक साधारण अर्थ और दूसरा गूढ़ साधना से संबंधित अर्थ। शबरपा ने सहजता के मार्ग को आगे बढ़ाया और वे सिद्ध परंपरा के अगले महत्त्वपूर्ण कवि लुइपा के गुरु भी बने।
शबरपा की कविताएं
