गोरखवाणी

गोरख वाणी महायोगी गुरु गोरखनाथ के उपदेशों और दार्शनिक विचारों का संकलन है, जिसे गोरखबानी या गोरख बाणी के नाम से जाना जाता है। यह नाथ संप्रदाय का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है और हिंदी साहित्य के आरंभिक काल की महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है।


मुख्य विशेषताएँ और महत्व

योग और साधना का सार: ‘गोरख वाणी’ में हठयोग और राजयोग के सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन है। यह साधक को आत्म-तत्व को जानने, मन को वश में करने और संसार के प्रपंचों से मुक्त होकर अमरत्व प्राप्त करने की राह दिखाती है।
दार्शनिक उच्चता: इसमें गुरु गोरखनाथ ने उच्च दार्शनिक विचारों को सरल और स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत किया है। इसमें काया-साधना (शरीर को योग द्वारा सिद्ध करना), गुरु-महिमा, संयम-नियम और वैराग्य पर विशेष बल दिया गया है।
भाषा और शैली: गोरख वाणी की भाषा को सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी कहा जाता है, जिसमें विभिन्न बोलियों का मिश्रण है। इसकी रचनाएँ मुख्य रूप से सबदी (शब्द का अपभ्रंश रूप, दोहे की तरह का छंद) और पदों के रूप में हैं।
भक्ति काल पर प्रभाव: गोरख वाणी ने हिंदी साहित्य के भक्ति काल की पृष्ठभूमि तैयार की। संत कवि कबीर और अन्य संतों के कवित्व पर गोरखनाथ के विचारों और शैली का गहरा प्रभाव देखने को मिलता है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने गोरखनाथ को आदि शंकराचार्य के बाद भारत का दूसरा सबसे प्रभावशाली महापुरुष कहा है।
जीवनचर्या का मार्गदर्शन: यह केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि एक जीवन-मार्गदर्शिका भी है, जो साधक को कम भोजन, कम नींद, आलस्य त्यागने और क्रोध के सामने शांत रहने जैसे व्यवहारिक उपदेश देती है।


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