गोरखवाणी : यूपीएचईएससी असिस्टेंट प्रोफेसर पाठ्यक्रम में चयनित पद

संपादक – डॉ०पितांबर दत्त बड़थ्वाल

बसती न सुंन्यं सुंन्यं न बसती अगम अगोचर ऐसा।
गगन-सिषर महिं बालक बोलै ताका नाँव धरहुगे कैसा।।१।।

वेदे न सास्त्रे कबेते न कुराणे पुस्तके न बंच्या जाई।
ते पद जांनां बिरला जोगी और दूनी सब धंधै लाई।।६।।

हंसिबा षेलिबा रहिबा रंग। कांम क्रोध न करिबा संग।
हंसिबा षेलिबा गाइबा गीत। दिढ करि राषि आपना चीत।।७।।

महंमद महंमद न करि काजी महंमद का विषम बिचारं।
महंमद हाथि करद जे होती लोहै घड़ी न सारं।।९।।

नाथ कहतां सब जग नाथ्या गोरष कहतां गोई।
कलमा का गर महंमद होता पहलै मूवा सोई।।११।।

सारमसारं गहर गंभीरं गगन उछलिया नादं।
मानिक पाया फेरि लुंकाया झूठा बाद-बिंबादं।।12।।

उतपति हिन्दू जरणां जोगी अकलि परि मुसलमांनी।
ते राह चीन्हों काजी मुलां ब्रह्मा बिस्नु महादेव मांनों।।१४।।

मांन्यां सबद चुकाया दंद। निहचै राजा भरथरी परचै गोपीचंद।
निहचै नरवै भए निरंद| परचै जोगी परमानंद।।१५।।

अरधै जाता ऊरधै धरै, कांम दगध जे जोगी करै।
तजै अल्यंगन काटै माया, ताका बिसनु पषालै पाया।।१७।।

भरया ते थीरं झालझलंती आधा।
सिधें सिध मिल्या रे अवधू बोल्या अरु लाधा।।२८।।

स्वामी बन षंडि जाउं तो षुध्या व्यापै नग्री जाउं त माया।
भरि भरि षाउं त बिंद बियापै क्यों सीझति जल ब्यंद की काया।।२३।।

थोड़ा बोलै थोड़ा षाइ तिस घटि पवनां रहै समाइ।
गगन मंडल से अनहद बाजै प्यंड पड़ै तो सतगुर लाजै।।३२।।

अवधू अहार तोडौ, निद्रा मोडौ कबहुँ, न होइगा रोगी|
छठै छ मासै काया पलटिबा ज्यूं को को बिरला बिजोगी ।।३३।।

अति अहार यंद्री बल करै नासै ग्यांन मैथुन चित धरै।
व्यापै न्यंद्रा झंपै काल ताके हिरदै सदा जंजाल ।।३६।।

अमरा निरमल पाप न पुंनि। सत रज बिबरजित संनि |
सोहं हंसा सुमिरै सबद। तिहिं परमारथ अनंत सिध ।।४६।।

अवधू नव घाटी रोकि लै बाट। बाई बणिजै चौसठि हाट|
काया पलटै अबिचल बिध। छाया बिबरजित निपजै सिध ।।५१।।

अवधू दंम कौं गहिबा उनमनि रहिबा, ज्यूं बाजबा अनहद तूरं।
गगन मंडल मैं तेज चमकै, चंद नहीं तहां सूरं ।।५२।।

अवधू सहंस्र नाड़ी पवन चलैगा,कोटि झमंकै नांदं|
बहतरि चंदा बाई सोष्या किरणि प्रगटी जब आदं ।।५४||

अमावस कै घरि झिलमिलि चंदा, पूनिंम कै घरि सूरं|
नाद कै घरि ब्यंद का बाजंत अनहद तूरं ||५५||

अवधू प्रथम नाडी नाद झमंकै, तेजंग नाडी पवनं|
सीतंग नाड़ी ब्यंद का बासा, कोई जोगी जानत गवनं।। ५७।।

उतरषंड जाइबा सुंनिफल षाइबा, ब्रह्म अगनि पहरिबा चीरं|
नीझर झरणै अंमृत पीया यूं मन हूवा थीरं||६८||

हिन्दू ध्यावै देहुरा मुसलमान मसीत|
जोगी ध्यावै परमपद जहाँ देहुरा न मसीत||६९||

रूपा महंमद सोना षुदाई, दुहुँ बिचि दुनियां गोता षाई।
हम तो निरालंभ बैठे देषत रहैं ऐसा, एक सुषन बाबा रतनहाजी कहै ।।११९।।

हिरदा का भाव हाथ मैं जाणिये यहु कलि आई षोटी।
बदंत गोरष सुणौ रे अवधू करवै होई सु निकसै टोटी ||१२३||

यंद्री का लड़बड़ा जिभ्या का फूहड़ा। गोरष कहै ते पर्तषि चूहड़ा।
काछ का जती मुष का सती। सो सत पुरुष उंतमो कथी।।१५३।।

बसती न सुंन्यं सुंन्यं न बसती अगम अगोचर ऐसा।
गगन-सिषर महिं बालक बोलै ताका नाँव धरहुगे कैसा।।१।।

वेदे न सास्त्रे कबेते न कुराणे पुस्तके न बंच्या जाई।
ते पद जांनां बिरला जोगी और दूनी सब धंधै लाई।।६।।

हंसिबा षेलिबा रहिबा रंग। कांम क्रोध न करिबा संग।
हंसिबा षेलिबा गाइबा गीत। दिढ करि राषि आपना चीत।।७।।

महंमद महंमद न करि काजी महंमद का विषम बिचारं।
महंमद हाथि करद जे होती लोहै घड़ी न सारं।।९।।

नाथ कहतां सब जग नाथ्या गोरष कहतां गोई।
कलमा का गर महंमद होता पहलै मूवा सोई।।११।।

सारमसारं गहर गंभीरं गगन उछलिया नादं।
मानिक पाया फेरि लुंकाया झूठा बाद-बिंबादं।।12।।

उतपति हिन्दू जरणां जोगी अकलि परि मुसलमांनी।
ते राह चीन्हों काजी मुलां ब्रह्मा बिस्नु महादेव मांनों।।१४।।

मांन्यां सबद चुकाया दंद। निहचै राजा भरथरी परचै गोपीचंद।
निहचै नरवै भए निरंद| परचै जोगी परमानंद।।१५।।

अरधै जाता ऊरधै धरै, कांम दगध जे जोगी करै।
तजै अल्यंगन काटै माया, ताका बिसनु पषालै पाया।।१७।।

भरया ते थीरं झालझलंती आधा।
सिधें सिध मिल्या रे अवधू बोल्या अरु लाधा।।२८।।

स्वामी बन षंडि जाउं तो षुध्या व्यापै नग्री जाउं त माया।
भरि भरि षाउं त बिंद बियापै क्यों सीझति जल ब्यंद की काया।।२३।।

थोड़ा बोलै थोड़ा षाइ तिस घटि पवनां रहै समाइ।
गगन मंडल से अनहद बाजै प्यंड पड़ै तो सतगुर लाजै।।३२।।

अवधू अहार तोडौ, निद्रा मोडौ कबहुँ, न होइगा रोगी|
छठै छ मासै काया पलटिबा ज्यूं को को बिरला बिजोगी ।।३३।।

अति अहार यंद्री बल करै नासै ग्यांन मैथुन चित धरै।
व्यापै न्यंद्रा झंपै काल ताके हिरदै सदा जंजाल ।।३६।।

अमरा निरमल पाप न पुंनि। सत रज बिबरजित संनि |
सोहं हंसा सुमिरै सबद। तिहिं परमारथ अनंत सिध ।।४६।।

अवधू नव घाटी रोकि लै बाट। बाई बणिजै चौसठि हाट|
काया पलटै अबिचल बिध। छाया बिबरजित निपजै सिध ।।५१।।

अवधू दंम कौं गहिबा उनमनि रहिबा, ज्यूं बाजबा अनहद तूरं।
गगन मंडल मैं तेज चमकै, चंद नहीं तहां सूरं ।।५२।।

अवधू सहंस्र नाड़ी पवन चलैगा,कोटि झमंकै नांदं|
बहतरि चंदा बाई सोष्या किरणि प्रगटी जब आदं ।।५४||

अमावस कै घरि झिलमिलि चंदा, पूनिंम कै घरि सूरं|
नाद कै घरि ब्यंद का बाजंत अनहद तूरं ||५५||

अवधू प्रथम नाडी नाद झमंकै, तेजंग नाडी पवनं|
सीतंग नाड़ी ब्यंद का बासा, कोई जोगी जानत गवनं।। ५७।।

उतरषंड जाइबा सुंनिफल षाइबा, ब्रह्म अगनि पहरिबा चीरं|
नीझर झरणै अंमृत पीया यूं मन हूवा थीरं||६८||

हिन्दू ध्यावै देहुरा मुसलमान मसीत|
जोगी ध्यावै परमपद जहाँ देहुरा न मसीत||६९||

रूपा महंमद सोना षुदाई, दुहुँ बिचि दुनियां गोता षाई।
हम तो निरालंभ बैठे देषत रहैं ऐसा, एक सुषन बाबा रतनहाजी कहै ।।११९।।

हिरदा का भाव हाथ मैं जाणिये यहु कलि आई षोटी।
बदंत गोरष सुणौ रे अवधू करवै होई सु निकसै टोटी ||१२३||

यंद्री का लड़बड़ा जिभ्या का फूहड़ा। गोरष कहै ते पर्तषि चूहड़ा।
काछ का जती मुष का सती। सो सत पुरुष उंतमो कथी।।१५३।।

बसती न सुंन्यं सुंन्यं न बसती अगम अगोचर ऐसा।
गगन-सिषर महिं बालक बोलै ताका नाँव धरहुगे कैसा।।१।।

वेदे न सास्त्रे कबेते न कुराणे पुस्तके न बंच्या जाई।
ते पद जांनां बिरला जोगी और दूनी सब धंधै लाई।।६।।

हंसिबा षेलिबा रहिबा रंग। कांम क्रोध न करिबा संग।
हंसिबा षेलिबा गाइबा गीत। दिढ करि राषि आपना चीत।।७।।

महंमद महंमद न करि काजी महंमद का विषम बिचारं।
महंमद हाथि करद जे होती लोहै घड़ी न सारं।।९।।

नाथ कहतां सब जग नाथ्या गोरष कहतां गोई।
कलमा का गर महंमद होता पहलै मूवा सोई।।११।।

सारमसारं गहर गंभीरं गगन उछलिया नादं।
मानिक पाया फेरि लुंकाया झूठा बाद-बिंबादं।।12।।

उतपति हिन्दू जरणां जोगी अकलि परि मुसलमांनी।
ते राह चीन्हों काजी मुलां ब्रह्मा बिस्नु महादेव मांनों।।१४।।

मांन्यां सबद चुकाया दंद। निहचै राजा भरथरी परचै गोपीचंद।
निहचै नरवै भए निरंद| परचै जोगी परमानंद।।१५।।

अरधै जाता ऊरधै धरै, कांम दगध जे जोगी करै।
तजै अल्यंगन काटै माया, ताका बिसनु पषालै पाया।।१७।।

भरया ते थीरं झालझलंती आधा।
सिधें सिध मिल्या रे अवधू बोल्या अरु लाधा।।२८।।

स्वामी बन षंडि जाउं तो षुध्या व्यापै नग्री जाउं त माया।

भरि भरि षाउं त बिंद बियापै क्यों सीझति जल ब्यंद की काया।।२३।।
थोड़ा बोलै थोड़ा षाइ तिस घटि पवनां रहै समाइ।
गगन मंडल से अनहद बाजै प्यंड पड़ै तो सतगुर लाजै।।३२।।

अवधू अहार तोडौ, निद्रा मोडौ कबहुँ, न होइगा रोगी|
छठै छ मासै काया पलटिबा ज्यूं को को बिरला बिजोगी ।।३३।।

अति अहार यंद्री बल करै नासै ग्यांन मैथुन चित धरै।
व्यापै न्यंद्रा झंपै काल ताके हिरदै सदा जंजाल ।।३६।।

अमरा निरमल पाप न पुंनि। सत रज बिबरजित संनि |
सोहं हंसा सुमिरै सबद। तिहिं परमारथ अनंत सिध ।।४६।।

अवधू नव घाटी रोकि लै बाट। बाई बणिजै चौसठि हाट|
काया पलटै अबिचल बिध। छाया बिबरजित निपजै सिध ।।५१।।

अवधू दंम कौं गहिबा उनमनि रहिबा, ज्यूं बाजबा अनहद तूरं।
गगन मंडल मैं तेज चमकै, चंद नहीं तहां सूरं ।।५२।।

अवधू सहंस्र नाड़ी पवन चलैगा,कोटि झमंकै नांदं|
बहतरि चंदा बाई सोष्या किरणि प्रगटी जब आदं ।।५४||

अमावस कै घरि झिलमिलि चंदा, पूनिंम कै घरि सूरं|
नाद कै घरि ब्यंद का बाजंत अनहद तूरं ||५५||

अवधू प्रथम नाडी नाद झमंकै, तेजंग नाडी पवनं|
सीतंग नाड़ी ब्यंद का बासा, कोई जोगी जानत गवनं।। ५७।।

उतरषंड जाइबा सुंनिफल षाइबा, ब्रह्म अगनि पहरिबा चीरं|
नीझर झरणै अंमृत पीया यूं मन हूवा थीरं||६८||

हिन्दू ध्यावै देहुरा मुसलमान मसीत|
जोगी ध्यावै परमपद जहाँ देहुरा न मसीत||६९||

रूपा महंमद सोना षुदाई, दुहुँ बिचि दुनियां गोता षाई।
हम तो निरालंभ बैठे देषत रहैं ऐसा, एक सुषन बाबा रतनहाजी कहै ।।११९।।

हिरदा का भाव हाथ मैं जाणिये यहु कलि आई षोटी।
बदंत गोरष सुणौ रे अवधू करवै होई सु निकसै टोटी ||१२३||

यंद्री का लड़बड़ा जिभ्या का फूहड़ा। गोरष कहै ते पर्तषि चूहड़ा।
काछ का जती मुष का सती। सो सत पुरुष उंतमो कथी।।१५३।।


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