अपराजित

  जैसे ही घड़ी ने आठ बजाये वह फैक्ट्री के दरवाजे पर पहुँच चुका था। दोनों चौकीदारों ने बस अलसाई नजरों से देखा भर और जाने दिया। वह अपनी साधारण चाल से कदम बढ़ाते हुए फैक्ट्री के भीतर दाखिल हो गया। कमरा एकदम साधारण था। वहां पर एक पुरानी टाइप की टेबिल व दो कुर्सियां आमने सामने रखी हुई थी। टेबिल के दराज से पुराना कपड़ा निकाल कर उसने जमी धूल साफ की, फिर कुर्सी पर बैठ गया। वहॉं पड़े पुराने से रजिस्टर पर उसने अपने हस्ताक्षर कर उपस्थिति दर्ज कर दी जिसका कोई महत्व नहीं था। छत पर लगे पंखे में कोई हरकत नहीं थी क्योंकि फैक्ट्री की बिजली कट चुकी थी। कमरे में खुली खिड़़की से वह सामने का बड़ा हॉल देख सकता था, जिसमें मशीनें तरतीबबार पड़ी हुई थी। एकदम शांत और निश्चल। मानो उनकी शक्ति किसी ने छीन ली हो। उनमें जमी धूल की परतें बता रही थी कि वह बरसों से इसी हालत में पड़ी हैं। छत पर लगे पंखों में भी मिटटी की मोटी परतें जम गयी थी। वहां पर अनेकों जगह चिड़िया और कबूतरों ने अपने डेरे बना लिये थे। वह बहुत चाहता था उन मशीनों को साफ सुथरा कर दे पर उसे अन्दर प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी। वह बस खिड़की से नजरें टिकाये उनसे बातें करता रहता। कभी-कभी कोई हल्का सा हवा का झोंका उससे टकरा कर पसीने से राहत दे जाता।

      वह कुर्सी पर बैठ कर अपने पुराने कागजों को पढ़ते हुए फाइल पर लिखना शुरू कर देता, फिर कुछ काट छांट करते हुए अपनी डायरी में तारीखें अंकित करने लगता। उसकी डायरी से मालूम होता है कि यह फैक्ट्री पिछले तीन साल व दो महिने से बन्द पड़ी है। जैसे ही सरकार बदली उसके मंत्रियों को लगा मैनेजमेंट के कुछ अधिकारी विपक्षी दलों से लगाव रखते हैं। इससे फैक्ट्री को मिलने वाली राशि में कटौतियां शुरू हो गयी जिससे खराब मशीनों को सुधारना बन्द हो गया। इसका असर यह हुआ कि अच्छा खासा प्रोडक्शन कम होते होते बन्द हो गया। फलस्वरूप कर्मचारियों को वेतन मिलना बन्द हो गया। कुछ जुगाड़ू अधिकारियों और कर्मचारियों ने अपना स्थानांतरण अन्य फैक्ट्री में करवा लिया और कुछ कर्मचारी घर बैठा दिये गये, जिनमें वह सुपरवाइजर भी शामिल था जो फैक्ट्री में पिछले बीस वर्षों से कार्य कर रहा था और इसे अपना धर्म, अपना घर, अपना मन्दिर, अपना तीर्थ मानता था। शायद ही कोई ऐसा दिन गया होगा जब घड़ी की सूई ने आठ बजाये हों और वह फैक्ट्री के गेट के अन्दर नहीं हो। दरवाजे में प्रवेश करते ही सीढियां चढने से पहले वह मन्दिर की तरफ सिर झुका कर ईश्वर का नाम लेता और अन्दर प्रवेश करता था। पहले अपनी उपस्थिति पंजिका में अपनी उपस्थिति दर्ज करता और पूरे हॉल का चक्कर लगा कर हर एक मशीन का मुआयना कर लेता । उस पर जरा सी भी धूल जमा होने पर उसे साफ करने करने की हिदायतें दे डालता था। तब तक अधिकतर कर्मचारी आकर अपना कार्य शुरू कर चुके होते थे। जो भी कर्मचारी देरी से आता उससे वह स्पष्टीकरण जरूर मांगता और भविष्य में समय पर आने की चेतावनी दे डालता।
 
      इन बीस वर्षों में पहले भी कई् बार सरकारें बदली पर इस फैक्ट्री में यथावत कार्य चलता रहा। राज्य में चलने वाले प्रमुख उद्योगों में इसका नाम था। इसमें निर्मित अधिकतर माल बिना लाभ के विक्रय किया जाता था इसलिये यह फैक्ट्री लाभ नहीं कमा पाती थी। परंतु इसके माल की क्वालिटी काफी बेहतर थी। इस फैक्ट्री से सैकडों लोगों को रोजगार मिला हुआ था और उनके परिवार पल रहे थे। सबसे अच्छी बात यह थी कि जनता को रियायती दर पर उत्तम क्वलिटी का माल मिल रहा था। इस बार जैसे ही सरकार बदली कुछ मंत्रियों को भ्रम हो गया कि फैक्ट्री का मैनेजमेंट विपक्षी सरकार का समर्थन करता था, अतः  इसके बजट में कटौतियां आरंभ कर दी गयी। सैकड़ों दलीलों के बावजूद प्रशासन में कमियां गिना कर फैक्ट्री को एक साल के भीतर बन्द होने के कागार पर ला खड़ा किया। यद्यपि ऊपर के मैनेजमेंट पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि उन्होंने अपना तबादला अन्य स्थानों में करवा लिया। धीरे धीरे अन्य कर्मचारियों ने भी अपना अन्य विभागों में सामंजस्य बैठा लिया। शेष रह गये उसके जैसे गिने चुने कर्मचारी जिनको अंततः घर बैठना पड़ गया। वह किसी अन्य स्थान में जाने को कतई तैयार नहीं था। साल भर तक बिना वेतन के इधर उधर की व्यवस्था से घर का गुजारा चलता रहा। इस बीच घर का लग्जरी सामान व कार बिक चुकी थी। गनीमत थी कि बड़े बच्चे को घर चलाने लायक नौकरी मिल गयी।
 
  उसका अंतर्मन किसी भी प्रकार से यह मानने को तैयार नहीं था कि उसे नौकरी से निकाल दिया गया है और फैक्ट्री बन्द हो गयी है। पिछले तीन वर्षों से वह नियमित रूप से फैक्ट्री आता रहा है। वह बार बार लोगों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करता है कि वह एक दिन इस फैक्ट्री को चलवाने में सफल होगा। कई बार तो वह इतना भावुक हो जाता है कि इसे अपनी मॉं बता कर पूछने लगता है कि इसे कैसे छोड़ा जा सकता है। कुछ लोग इसे भावना में बहने वाला बेवकूफ समझ कर उसका समर्थन कर प्रकरण समाप्त करने की कोशिश करने लगते तो कुछ लोग उसे वास्तविकता समझाने का असफल प्रयास करने लगते हैं।
 
     फैक्ट्री पर आने के बाद पिछले दो वर्षों में उसने न जाने कितने लम्बे लम्बे लेख लिख कर अखबारों में भिजवाने शुरू कर दिये थे। इस बीच उसने अनेकों पत्र सरकारी मंत्रियों को भी पोस्ट कर डाले थे। जैसे ही फैक्ट्री में कोई पत्र आता वह बड़े गौर से उसे देखता और खोलने लगता। इस आशा के साथ कि उसे अपने पत्र का जवाब मिलेगा, परंतु ऐसा कुछ नहीं होता। वह हताश होकर रुके हुए पंखे को देखने लगता। फिर खुद ही अपने को दिलासा देने लगता कि वह कभी तो कामयाबी प्राप्त करेगा। एक दिन जैसे ही उसने जाना कि केन्द्र से कोई मंत्री उनके शहर आ रहे हैं, वह धक्के मुक्के खाता हुआ उनके पास पहुँच गया और फैक्ट्री शुरू करने का आग्रह पत्र मंत्रीजी को देने में सफल हो गया।
 
     ऐसे ही एक दिन वह अलसाया सा बैठा अपनी फाइल लिखने पढ़ने में लगा हुआ था कि अचानक उसे फैक्ट्री के गेट पर एक बड़ी गाडी रुकने की आवाज आई। कुछ देर में तीन अधेड़ उम्र के व्यक्ति फैक्ट्री के अन्दर प्रवेश कर चुके थे। उसे लगा उसने अपना खोया हुआ खजाना प्राप्त कर लिया है। वह नई उमंग से भर गया और उसमें पहले से कई गुना ऊर्जा भर गयी। अपनी कमीज व पेंट ठीक कर वह सीधा उनके पास जाकर खड़ा हो गया।
-“तुम यहां के चौकीदार हो?” उनमें से किसी एक ने उसे सामने खड़ा देख कर सवाल किया। 
– “नहीं नहीं मैं यहॉं का सुपरवाइजर हूँ।” उसने थोड़ा सा अकड़ कर जवाब दिया। वह बहुत देर से इंतजार कर रहा था कि उसे फैक्ट्री व मशीनों  के विषय में, मैनेजमेंट के बारे में बात की जाए। उसने अपने आपको पढ़ा-लिखा साबित करने के लिये कुछ अंग्रेजी शब्द भी मन ही मन सोच लिये थे। उनकी बातचीत के बीच में उसने कई बार बोलने का प्रयास किया परंतु उन लोगों की रुचि मशीनों की जांच में अधिक थी।
 
     दूसरे दिन समाचार पत्रों में जब समाचार आया कि सरकार फैक्ट्री पुनः चालू करने पर विचार कर रही है तो वह खुशी से झूम उठा। एक स्थानीय पत्र में उसका नाम भी छपा था जिसे पढ़़ कर तो ऐसा महसूस होने लगा था जैसे उसने बहुत बडी लॉटरी हासिल कर ली है। वह अपने हर परिचि – अपरिचित को यह बात बताना चाह रहा था। जब कभी भी इसकी चर्चा होती वह जेब से अखबार की कटिंग निकाल कर दिखाना नहीं भूलता।
     कुछ ही महिनों में फैक्ट्री में फिर से हलचल आरंभ हो गयी और इंजिनियर्स की टीम मशीनों को चालू करने में लग गयी। वह सुबह से शाम तक फैक्ट्री की देख – रेख में जुट गया और हर किसी को मशीनों की जानकारी देने लगा। उसके चेहरे का उत्साह देखते ही बनता था।
 
     दो महिने में ही फैक्ट्री की मशीनें दुरस्त करली गईं और वह पहले की तरह चालू अवस्था में आ गयी। इस बीच फैक्ट्री का नया मैनेजमेंट भी बना दिया गया और वर्कर्स भी नियुक्त करने शुरू हो गये। परंतु इन सब में उसका कहीं भी नाम नहीं था। वह बार बार अपनी दलील देता रहा कि वह बीस वर्षों से यहॉं काम कर चुका है पर फैक्ट्री के नये मैनेजमेंट में उसकी कोई आवश्यकता नहीं समझी गयी।
 
     एक बार फिर फैक्ट्री अपनी अपने जोशीले अन्दाज से चलने लगी थी। तेज गति से गाड़ियां गेट में प्रवेश कर रही थीं। वर्कर्स भी नयी यूनीफार्म के साथ अन्दर – बाहर आ जा रहे थे। लग रहा था जैसे वह जमीन पर पड़ा हुआ है और सारे लोग उसके ऊपर से निकल रहे हैं। फिर वह पथराई आखों से फैक्ट्री की चिमनी के धूंए को उड़ते देख रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे फैक्ट्री के कचरे के साथ उसे भी बाहर कर दिया गया है।
       कुछ ही देर बाद उसने अपनी विचारधारा में परिवर्तन कर अपने चेहरे पर जोर से मुस्कराहट फैलाई। उसने तय किया कि वह अपनी नौकरी की चिंता नहीं करेगा। उसने फैक्ट्री फिर से शरू करवाने का मिशन जीत लिया है और वह विजेता की तरह उठ कर खड़ा हो गया। उसे याद आया कि ऐसे ही एक और फैक्ट्री तीन वर्षों से बन्द पड़ी है। अपने शरीर में नई स्फूर्ति पैदा की और वह चल पड़ा उस बंद कारखाने, अपने नये मिशन की तरफ।


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