मासिक पीड़ा से छटपटा रही थी तुम
दूसरी तरफ चिल्ला रही थी नन्ही बिटिया
जब कुछ समझ में नहीं आया
थोड़ी देर तुमसे लिपटकर लेटा रहा
फिर बोतल में दूध ढाला तुम्हें गरम पानी का बैग दिया
बेटी को पैर पर रखकर सुलाया
गाता रहा उसके पसंद का गाना
उसके सोने के बाद भी
ये वो दिन थे—
जब सब मान चुके थे
औरत का नौकरी करना ज़रूरी है
लेकिन किसी को नहीं था स्वीकार
कि घर बैठ जाए आदमी
बेटी का पोचाड़ा फींचता
तुम्हारा रक्त ब्रश से घिसता
दुखता था देह का पुर्जा–पुर्जा—
नचाती है तुम्हें
तुम मर्द नहीं
घरघुसरे!
सदियों का जमा मैल
मैं रगड़ता रहता हूँ
यहीं खड़ा हूँ
पुरुष प्रतीक के विरुद्ध।
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