होता है शबो रोज़ तमाशा मेरे आगे

यह नींद से बेदखल हुए सपनो की उबासी थी 
मेहनतकश औजार के हथियार बनने की प्रक्रिया में
नष्ट हुए हुनर – प्रेम और सद्भाव की दारुण कथा थी 

करतल ध्वनि में गूंजती रक्तिम अभिलाषाएं थीं
जिन्हें दूसरों का भय बड़ा भव्य लगता है 

दुनिया खूबसूरत बनाने का ख्वाब लिए 
नीली आंखों वाली कविता की
यह मौन में गिरी एक पंक्ति थी 

अनदेखी और अपमान की दरारों में समाती प्रतिभा थी 
जिसकी आह के दो शब्द 
महाकवियों की कल्पनाओं में समाते नही थे

अजनबीपन मारे शहर का एकांत उच्छवास था 
भीमकाय परछाई से दबी कृशकाय परछाई का अखंड मौन था 
एक पंक्ति थी जो लिखते लिखते छूट गई

आप कहेंगे यह क्या बात हुई 
सीधे सीधे क्यों नहीं कहते 

मेरे बच्चों एक समय कुछ ऐसा था 
कि एक क़ौम अपने आंसुओं में डूब रही थी
एक मुल्क अपने खोखलेपन पर उदास था
और एक बूढ़ी संस्कृति बड़ी बेबसी में 
श्रेष्ठता की छूत से ग्रस्त सभ्यताओं को 
हत्यारा बनते देख रही थी


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