चुपचाप जिंदगी

हमेशा कि तरह उस दिन भी हम वैसे ही बैठे हुए थे, शांत और चुपचाप। एक दूसरे को देखते हुए। एक दूसरे के चेहरे को पढ़ने की कोशिश करते हुए। हमारा दोनों का ही मानना था कि हमारी खामोशी सब कुछ कह जाती है। इसलिए -‘आज मौसम बहुत अच्छा है’ – ‘ओह कितनी सर्दी है, – ‘तुम कितनी खूबसूरत हो’ – ‘मैं जिंदगी भर सिर्फ तुमको ही चाहती रहूंगी’, -‘हम दोनों कभी जुदा नहीं होंगे’ जैसी निरर्थक बातें आज के जमाने में कोई मायने नहीं रखती। हम एक दूसरे को इतना अधिक समझ चुके थे कि बिना बोले ही समझ जाते थे कि क्या कहना चाहते हैं।
जैसे ही रात गहराने लगती है स्वधा आसमान की तरफ देखने लगती। आंखों ही आंखों में, मैं उसे कुछ देर और रुकने का आग्रह करने लगता। यह भी शायद हमारी आदत का हिस्सा था। मैं चाहता था कि समय ठहरा रहे और हम भूख प्यास की चिंता के बिना ऐसे ही बैठे रहें और मैं उसके पास होने का अहसास महसूस करता रहूं।
– ‘अब चले’, कहने वाले अंदाज में वह उठ खड़ी होती। मैं भी उठकर, टहलते हुए, उसे उसके घर की गली तक छोड़ आता। हम कभी भी यह वादा नहीं करते थे कि फिर कब मिलेंगे। मैं पूरे रास्ते उसकी एक-एक हरकत याद करते हुए अपने घर लौट आता। कभी लगता उसकी आंखें बहुत कुछ बोल जाती हैं। कभी लगता उसके चलने के ढंग में सौम्यता है।
पिछले तीन सालों से हम इसी प्रकार मिलते रहे। इन तीन सालों में हमने इतनी ही बातचीत की होगी कि जिसे अंगुलियों पर गिना जा सकता है। यहां तक कि हमने एक-दूसरे का नाम भी बुक्स शेयर करते हुए जाने थे। पहली बार मैंने उसे आइसक्रीम पार्लर में देखा था। उसके आइसक्रीम खरीदने के अंदाज से मैं सहज ही समझ गया कि वह अक्सर यहां आती है। उससे मिलने की खातिर मैं भी वहां आकर बैठा रहता था। प्रायः चार पांच दिन के अन्तराल में वह मुझे मिल ही जाती थी। जैसे ही वह अकेली खड़ी आइसक्रीम खा रही होती मैं उसके पास जाकर खड़ा हो जाता। जब भी वह मेरी तरफ देखती मैं हल्का सा मुस्कुरा देता। धीरे-धीरे उसने मेरी मित्रता स्वीकार कर ली और हमारी घनिष्ठता बढ़ती गई क्योंकि हमारी आदतें और हमारी पसंद आपस में बहुत कुछ मिलती-जुलती थी। हम दोनों ही तामझाम होटलबाजी या अनाप-शनाप खर्च करने में विश्वास नहीं रखते थे। अतः हम अक्सर किसी कैफे में कॉफी पीते हुए या कहीं कोल्ड ड्रिंक पीते हुए घंटों साथ बैठे रहते थे, पर यह आइसक्रीम पार्लर ही हमारी पसंदीदा जगह थी। दिवाली या नववर्ष की संध्या पर जब सभी लोग त्योहार मनाने में व्यस्त रहते थे तब भी हम इसी आइसक्रीम पार्लर के सामने बने पार्क पर देर तक अकेले बैठे रहते थे। हमको किसी भी अन्य व्यक्ति या समाज से सरोकार नहीं था। उसकी अंगुलियों का हल्का सा स्पर्श मेरे शरीर में नई ऊर्जा भर देता था। -‘अब हम नहीं मिलेंगे।’ एक दिन जब हम एक दूसरे से अलग हो रहे थे तो वह बोल पड़ी। मैं उसकी बात सुनकर हतप्रभ हो गया पर मैंने उसका कारण नहीं पूछा, क्योंकि मुझे पता था कि वह यही कहेगी कि मैं दूसरे शहर में नौकरी ज्वाइन करने जा रही हूं। या कहेगी घरवालों ने मेरी शादी तय कर दी है।
सचमुच इसके बाद हम नहीं मिल पाये। मुझे मालूम था कि अब वह नहीं आएगी फिर भी कितने ही दिनों तक मैं घंटों आइसक्रीम पार्लर में, कैफे में बैठ कर उसकी प्रतीक्षा करता रहा। सचमुच वह नहीं आई।

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