टुसू : कृषि संस्कृति, नारी शक्ति एवं लोक-आस्था का पर्व

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टुसू पर्व पूर्वी भारत के झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के कुछ हिस्सों तथा असम के चाय बागानों में मनाया जाता है। इसे मनाने वाले प्रमुख आदिवासी समुदाय कुड़मी महतो, भूमिज, संथाल, मुंडा, हो तथा खड़िया हैं। यह पर्व मुख्यतः फसल कटाई के उल्लास और समृद्धि की कामना से जुड़ा है। पौष महीने के अंतिम दिन यानी मकर संक्रांति (मध्य जनवरी) को इसका भव्य समापन होता है। यह उत्सव केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं बल्कि एक महीने तक चलने वाला सांस्कृतिक, सामाजिक और कृषि आधारित अनुष्ठान है जो नारी शक्ति के सम्मान, त्याग और लोक-एकता का प्रतीक है।
टुसू पर्व जिसे ‘टुसू परब’, ‘पूस परब’ या ‘मकर परब’ के नाम से भी जाना जाता है भारतीय लोक-संस्कृति का एक अमूल्य हिस्सा है। यह मुख्यतः कृषि समाज से जुड़ा हुआ है जहाँ किसान धान की फसल की कटाई के बाद प्रकृति और अन्नपूर्णा का आभार व्यक्त करते हैं।
यह पर्व विशेष रूप से कुँवारी कन्याओं द्वारा मनाया जाता है जो टुसू देवी (जिसे कुछ क्षेत्रों में देवी लक्ष्मी या सरस्वती का रूप माना जाता है) की स्थापना और पूजा करती हैं। उत्सव का केंद्र बिंदु टुसू देवी की प्रतिमा (या प्रतीक) का निर्माण, उसकी आराधना और अंत में मकर संक्रांति पर उसका नदी में विसर्जन होता है। यह संपूर्ण प्रक्रिया कृषि चक्र के पूर्ण होने नव विवाहित कन्या के ससुराल गमन (पुनः प्रजनन और समृद्धि का आरंभ) और नारी के बलिदान की भावना को दर्शाती है।
टुसू पर्व की उत्पत्ति का कोई निश्चित लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है लेकिन इसकी जड़ें प्राचीन कृषि-संस्कृति और कई स्थानीय लोककथाओं में निहित है।
सबसे प्रचलित लोककथा एक गरीब कुर्मी किसान की अत्यंत सुंदर और साहसी बेटी टुसूमनी से जुड़ी है। कहानी के अनुसार, “टुसूमनी की सुंदरता पर राजा की बुरी नज़र थी और उसने उसे बलपूर्वक प्राप्त करने का षड्यंत्र रचा। टुसूमनी ने अपने स्वाभिमान, शील और गाँव वालों के सम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष किया। अंत में राजा के आक्रमण से बचने के लिए वह स्वर्णरेखा नदी में कूदकर जल समाधि ले ली।“ इस त्याग और बलिदान की गाथा को अमर करने के लिए कुर्मी और स्थानीय आदिवासी समुदाय प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति पर टुसू पर्व मनाते हैं। टुसूमनी को नारी शक्ति और स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है।
एक दूसरी कथा यह है जो भूमिज और संथाल लोगों में प्रचलित है, कहानी के अनुसार, “गुजरात के एक राजा की रुक्मिणी नामक पुत्री थी, जिसे टुसू नाम से भी पुकारा जाता था। राजकुमारी टुसू को पंजाब के एक राजकुमार सीताराम से प्रेम हुआ। लेकिन एक मुग़ल बादशाह रुक्मिणी की सुंदरता से आकर्षित होकर उसे पाना चाहता था। बादशाह को दोनों के रिश्ते का पाता चला, प्रेमियों को मुगल बादशाह के क्रोध से भागना पड़ा। दोनों भागकर संतालों के राज्य से होते हुए भूमिजों के राज्य में पहुंचे, जहां एक भूमिज राजा ने उन दोनों का विवाह कराया। कुछ दिन बाद रुक्मिणी (टुसू) के पति सीताराम का निधन हो गया। व्याकुल टूसू अपने प्रेमी के बिना जीवन का सामना नहीं कर सकी और पति की जलती चिता में कूद गई।“ इसके बाद से ही भूमिज, संथाल और कुड़मी टुसू पर्व को टुसू देवी की दया, सदाचार, प्रेम और बलिदान के प्रतीक के रूप में मनाते हैं।
कुछ लोकगीत और विद्वान टुसू को प्राचीन कृषि देवी तोशाली देवी  या तोषला से जोड़ते हैं। यह पर्व फसल कटाई के मौसम में मनाया जाता है और कुँवारी कन्याओं द्वारा इसकी पूजा का संबंध भूमि और नारी की प्रजनन क्षमता से है। ‘दिनीमाई’ की स्थापना: कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में धान के खेतों से काटी गई अंतिम धान की बालियों के गट्ठर को ‘दिनीमाई’ कहा जाता है, जिसे टुसू का प्रतीक मानकर घर लाया जाता है और पूजा की जाती है। कुर्मी अनुष्ठानों के अनुसार टुसू की तुलना कुँवारी कन्या से की जाती है। जिस प्रकार एक बेटी अपने मायके में बड़े लाड़-प्यार से पोषित होती है, उसी प्रकार फसल के अनाज और बीजों का ध्यान रखा जाता है। टुसू की विसर्जन यात्रा को नवविवाहित बेटी के ससुराल जाने (नए जीवन और नई पीढ़ी के आरंभ) के रूप में देखा जाता है।

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‘टुसू’ शब्द की उत्पत्ति को लेकर भी भिन्न मत हैं। एक मत यह है कि यह ‘कुँवारी’ शब्द से आया है। यह धान के छिलके यानी ‘तुष’  या ‘तूस’ से आया है जो बताता है कि यह मूल रूप से धान की देवी या फसल का उत्सव है।

टुसू पर्व एक दिवसीय उत्सव नहीं है यह अगहन संक्रांति से शुरू होकर लगभग एक महीने तक चलता है, जिसका भव्य समापन मकर संक्रांति को होता है। टुसू की स्थापना अगहन संक्रांति पर घर की कुँवारी लड़कियाँ गोबर के गोले और चावल के आटे के गोले (जिन पर सिंदूर के तीन टीके लगाए जाते हैं) से टुसू का प्रतीक बनाती हैं, जिसे कुछ घरों में छोटी मूर्ति का रूप भी दिया जाता है।  टुसू के प्रतीक को घर की दीवार में बनी ‘कुलुंगी’ (एक आला) में स्थापित किया जाता है। लड़कियाँ कुलुंगी को चावल के आटे से बनी अल्पना (कलाकृतियाँ) से सजाती हैं। लड़कियाँ रोज़ाना शाम को टुसू के सामने दीये जलाती हैं और अधना चावल (बिना उबाले हुए धान का चावल) तथा गेंदे के फूल अर्पित करती हैं। पूरे माह घर में मीठे पकवान (विशेषकर पीठा-चावल और तिल से बने व्यंजन) बनाए जाते हैं।

टुसू पर्व का सबसे महत्वपूर्ण और जीवंत पहलू इसके लोकगीत हैं, जिन्हें टुसू गीत या पूस गीत कहा जाता है। ये गीत गाँव की कुँवारी लड़कियाँ और महिलाएँ रोज़ शाम को टुसू के सामने और रात में अलाव के चारों ओर गाती है। टुसू गीतों में टुसू देवी के गुणगान, उनके बलिदान की गाथाएँ, कृषि और फसल की चर्चा, सामाजिक व्यंग्य, पारिवारिक रिश्ते, प्रेम और रोजमर्रा के जीवन के अनुभव शामिल होते हैं। ये गीत मौखिक परंपरा का हिस्सा हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते रहते हैं। एक लोकगीत देखिए-

“चान-तारारे, टुसू, तोरा माथा ऊँचाई बाँचबे
जो दिन बाँचे, मायेर बेटी, हिम्मत कभू ना हारबे।
धान काटेर काँचिया तोर हाथे, जुल्म सहबे ना आर,
धरती मायेर बेटियाँ हमरा, करबो अपन अधिकार।”
अर्थ: हे टुसू, तुम चाँद-तारों की तरह सिर ऊँचा करके जीना। यह पंक्ति आत्म-सम्मान और स्वाभिमान के साथ जीने की प्रेरणा देती है जो टुसू के बलिदान का मूल संदेश है। जितने दिन भी जीना माँ की बेटी तुम कभी हिम्मत मत हारना। यह महिलाओं को साहस और धैर्य बनाए रखने का आह्वान है, उनकी आंतरिक शक्ति को दर्शाता है। तुम्हारे हाथ में धान काटने का हँसिया है अब और ज़ुल्म नहीं सहेंगे। यह महिला को कृषि और जीवन की निर्माता के रूप में दर्शाता है जो अब अन्याय के विरुद्ध खड़ी होने को तैयार है। हँसिया यहाँ प्रतिरोध और शक्ति का प्रतीक है। हम धरती माँ की बेटियाँ हैं हम अपना अधिकार लेकर रहेंगी। यह अधिकारों के प्रति जागरूकता और सामूहिक नारी शक्ति को व्यक्त करता है।

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टुसू पर्व के गीतों में नारी शक्ति का संदेश सीधा उपदेश न होकर आत्म-सम्मान, साहस, परिश्रम और अन्याय के प्रति प्रतिरोध के भावों में गहरे रूप से समाया हुआ है।
पर्व के अंतिम दिनों में यानी मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर लड़कियाँ बाँस और रंगीन कागज़ों की सहायता से एक भव्य मंदिरनुमा संरचना बनाती हैं, जिसे चौड़ल कहा जाता है। चौड़ल को भव्य रूप से सजाया जाता है और टुसू देवी की प्रतिमा या प्रतीक को उसमें स्थापित किया जाता है। यह चौड़ल टुसू के लिए बनाया गया एक प्रतीकात्मक घर या रथ होता है, जिसे अंतिम विसर्जन यात्रा में ले जाया जाता है। मकर संक्रांति के दिन टुसू पर्व का समापन होता है। सुबह भक्त नदी या तालाब में पारंपरिक स्नान करते हैं। इसके बाद चौड़ल को पारंपरिक वाद्य यंत्रों जैसे ढाँसा और मादल की ताल पर, टुसू गीत गाते हुए जुलूस के रूप में नदी या पोखर तक ले जाया जाता है। टुसू देवी की प्रतिमा (या चौड़ल) को पानी में विसर्जित कर दिया जाता है। यह विसर्जन प्रकृति के साथ लयबद्धता, कृषि चक्र के पूर्ण होने और टुसूमनी के जल समाधि वाले बलिदान को याद करने का प्रतीक है।
टुसू पर्व केवल एक पूजा नहीं है बल्कि यह पूर्वी भारत के समुदायों के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को मजबूत करता है। यह पर्व मुख्य रूप से कुँवारी कन्याओं द्वारा संचालित होता है जो इसे नारी शक्ति के सम्मान और स्त्री स्वाभिमान के उत्सव के रूप में स्थापित करता है। कृषि और प्रकृति से संबंध: यह फसल कटाई का उत्सव है जो समुदाय के लोगों को अपनी धरती, फसल और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर देता है। टुसू गीत (लोकगीत) और लोक-नृत्य इस क्षेत्र की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करते हैं। यह युवा पीढ़ी को उनकी परंपराओं से जोड़ने का कार्य करता है। टुसू मेला और सामुदायिक समारोह विभिन्न जाति-जनजाति के लोगों को एक साथ लाते हैं, जिससे सामाजिक एकता और समरसता को बढ़ावा मिलता है।

टुसू पर्व पूर्वी भारत की कृषि-आधारित संस्कृति, लोक-आस्था और नारी-सम्मान का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। एक महीने तक चलने वाला यह उत्सव धान की कटाई के उल्लास से लेकर टुसूमनी के त्याग और बलिदान की गाथा के साथ-साथ जीवन के कई आयामों को समेटे हुए है। यह पर्व स्थानीय कला, संगीत और अनुष्ठानों के माध्यम से एक समृद्ध मौखिक परंपरा को जीवित रखता है। बदलते समय के साथ इस पर्व के कुछ पहलुओं में बदलाव आया है लेकिन इसकी मूल भावना—प्रकृति का आभार, समृद्धि की कामना और नारी के साहस का सम्मान—आज भी अटूट है। टुसू पर्व वास्तव में लोक-संस्कृति का एक ऐसा पर्व है जो एकीकरण, आनंद और बलिदान की भावना का संचार करता है। इस प्रकार यह पर्व धार्मिक विश्वास, पारंपरिक मान्यता, नये वर्ष के आगमन, अच्छे फसल की प्राप्ति और खुशहाली के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।

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