किसी पराये शहर में, बंद कमरों में
सिसकियां भरती प्रेमिकाओं की आंखों में
अक्सर देखे गये प्रेमियों आंसू
अबके बिछड़े तो शायद फिर मिले ही नहीं
प्रेमिकायें अपने प्रेमियो के आंसू
अपनी आंखों में सहेजती हैं
वे जब भी रोती हैं
प्रेमी की आंखों में समंदर मचलता है
भीगते हैं आहिस्ता-आहिस्ता
ताज़ा सपने और बासी रातें
तुम्हारी याद का ताजा खुदा
रोज बासी रात को जागता है
तुम्हारी याद आये तो
मरी हुई मछलियां तड़पने लगें
पानी प्यासा हो जाये
सारी रात जागती आंखों के आंसू
सुबह होते ही किसी बिनब्याही मां की तरह छिपकर
अपनी ही आंसुओं की पहरेदारी करते हुए
तुम्हें याद करें
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