कितनी आंसुओं से भरी हुई आंखें झांकती हैं
धरती के उस छोर से जहां आज भी लोग
मरने से पहले जी भरकर लड़ना चाहते थे
मृत्यु के द्वार पर खड़े वे चुप थे
उनके लिए जो चुप थे सदियों से
और एक बार बोलने के अपराध में मारे गये
भीड़ ने जब उनके भाई का कत्ल किया तो
बहन के लिए चुप थे
बहन के मारे जाने पर चुप थे अपनी खातिर
जब उन्हें मारा गया तो भी वो चुप थे
उन्हें लगता था उनके पुरखे लाश
के सिरहाने बैठकर अपनी कटी जबान से
बातें करते हैं और रोते हुए साथ ले जाते हैं उन्हें
उस जगह जहां लोग कभी मरते नहीं
पर कभी बोलते भी नहीं
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