वहशत में हैं सितारे कहीं शोर सा उठा है
किसी आसमां पे शायद कोई आसमां गिरा है
कभी बत्तियां बुझाना खुले आसमान तकना
सूरज की पीठ पर इक तारे ने कुछ लिखा है
ख़ुद से मिला हूँ ऐसे जैसे किसी का बेटा
मेले में खो गया था बाज़ार में मिला है
मुझे खुश्बुओं में ढूंढो मुझे ख़ाक से उठा लो
कोई फूल गुलसिताँ में दो बार कब खिला है
हाँ हुए हैं मीर ग़ालिब सदक़े उतरता हूँ
हम भी तबाह हुए हैं मेरा भी घर जला है
