हर आँख में आक्रोश क्यूँ है
हर ज़हन सरफ़रोश क्यूँ है
क्या हो गया है कहकहों को
ये शहर इतना ख़ामोश क्यूँ है
ज़ुबाँ उलझती क़दम बहकते
सभी को ऐसा ही होश क्यूँ है
सूरज तो सर तक आ पहुंचा
दिन इतना सियहपोश क्यूँ है
किसे दे रखी निगेहबानी
हर चेहरे पर ख़रोश क्यूँ है
