दुःख के जंगल उग आये हैं चेहरे की वीरानी में

उसको मंज़िल समझाते हो लफ़्ज़ों की आसानी में
जिसने सालों काट दिये है रस्तों की निगरानी में

अंदर के ज़ख़्म छुपाने की हर कोशिश बेकार हुई
दुःख के जंगल उग आये हैं चेहरे की वीरानी में

अब इस कमरे के अंदर सूरज का आना वर्जित है
अंधियारा फैला रखा है दिल की रोशनदानी में

दरिया के नज़दीक में रहकर भी मुद्दत से प्यासे हैं
लेकिन प्यास बुझाये कैसे ज़हर मिला है पानी में

उसकी शर्ते मान के सारी पा तो लेता उसको पर
खुद्दारी भी मर सकती थी मेरी इस नादानी में

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