खाली पटरियां जैसे रास्ता हैं
तुम्हारे घर का
मैं किसी को भी चुनूं
वो तुम पर ही आकर रुकेंगी
मेरे तुम्हारें बीच
एक रात रहती है
रात भर चलती हूँ
नींद में अपनी
सुबह तुम तक पहुँच जाने के लिए
ये सफ़र की रात कितनी लम्बी है
क्यों सुबह का साथ
रात होते होते छूटने लगता है
मैं हर रात तुमसे विदा कर
खाली पटरी पर चलने लगती हूँ
किसी सुबह तुम तक
फिर पहुँच जाने को
किसी रोज आऊँगी जरूर
एक सुबह को साथ लेकर
किसी रात
तुमसे मिलने
खाली पटरियाँ
मुकम्मल ख़्वाब हैं
और रात एक उड़ती हुई रेलगाड़ी
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