मैंने किताब कहाँ पढ़ी 

जो किताबें मिली 
उसके पन्नों पर एक भी अक्षर नहीं था
मुझे उनमें दो आँखें और कुछ सांसो के सिवा 
कुछ भी हाथ नहीं लगा

और मैं यहाँ आपकी आँखों
में अपनी तस्वीर देख रही हूँ। 
मैं छू रही हूँ
अपनी तस्वीर में उन एहसासों को 
जो छुपाकर भूल गयी थी
अपने भीतर किसी गहरे कोने में 
देख रही उन सत्यों को 
जो मेरी आँखों के देश में बसकर 
उसे सदा के लिए वीरान कर गए
 
मैंने किताब कहाँ पढ़ी 
मैंने खोल लिया
अपनी ही आत्मा का कोई पन्ना तुम्हारी आँखों में
मैंने देखी एक उदास शाम अपने ही पहलू में 
और एक अनमनी सुबह अपने सिरहाने


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