उस नसीबन के लिए जिसके लिए लौंडा बदनाम हो गया था

तुम किसी दूसरे लोक से नहीं आयी हो नसीबन!
तुम मेरे घर से, गाँव से
या उस मोहल्ले से आयी हो
जहाँ दरिद्रता सौ अवसर छीनकर
जिंदा रहने के लिये
एक सीपी-भर जगह छोड़ती है

नसीबन!
तुम बदनाम थी कितनों की निग़ाह में
पर कितने लौंडे तुम्हारे लिये बदनाम हो गये थे

तुम्हारा एक समय था नसीबन
फूल, इत्रों और काँटों से भरा
एक शामियाना था
जहाँ सभ्य से सभ्य समझा जाने वाला आदमी भी
चोरी-छिपे जाता था

रात उसकी सभ्यता को ढँक लेती थी

पर तुम्हें क्यों नहीं लग रहा अब भी तुम्हारा ही समय है नसीबन!
तुम गा सकती हो
बहुत सुंदर गा सकती हो

अश्लील गानों के लिये
अब दूसरे कारखाने लग गये हैं नसीबन
तुम्हारे गानों की कामुकता
और द्वि-अर्थीपन
उनसे तो बुरे नहीं हैं

तुम मत छोड़ो गाना

पान की लाली तुम्हारे होठों पर
अब भी उतनी ही लाल है
तुम्हारी पाजेब अब भी खनक रही है
उतनी ही तेज
तुम्हारे पाँव अब भी थिरक रहे हैं
बंजर ज़मीन के ऊपर लगे स्टेज पर
खेत जोतते हुए ट्रैक्टरों पर
तुम्हारे गीत अब भी बज रहे हैं

तुम चुप क्यों हो रही हो नसीबन!
क्यों चुप हो रही हो

इतनी नौटंकियों से गुजरता ये देश
तुम्हारी नौटंकी भले ही न देखे
पर गाओ नसीबन, गाओ!
तुम नाचो नसीबन, नाचो!

सुनो नसीबन-
ताराबानो फैज़ाबादी भी गा रही हैं
‘लौंडा बदनाम हुआ नसीबन तेरे लिये’

लौंडे, फिर से तुम्हें सुनना चाहते हैं
लौंडे, फिर से तुम्हें देखना चाहते हैं
लौंडे, फिर से बदनाम होना चाहते हैं…


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राजु
राजु

कविता कितने अपनेपन में नसीबन से बात कर रही, आहा। कवि को खूब बधाई शुभकामनायें मिठाई

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