नींद इन दिनों जब भी आती है
एक भटके हुए मुसाफ़िर की तरह आती है
रैन- बसेरा लेने के लिए पलकों में।
कन्धे से उतार कर रखती है अपनी गठरी जमीन पर
खोल कर उसमें उलट – पुलट
देखती है एक-एक सपने को- सब
सही-सलामत हैं कि नहीं।
तभी, पास के स्टेशन से गुज़रती किसी गाड़ी की
सीटी आती है आहिस्ता-आहिस्ता
हवा में तैरती हुई
कानों से गुज़रती है
नींद चौकन्ना हो जाती है
झट्-से समेटती है अपनी गठरी
और चल देती है
जाने किस गाड़ी पर सवार होने के लिए!
स्रोत – ‘उदासी का ध्रुपद’ संग्रह से साभार अवनीश यादव द्वारा बहता नीर के लिए चयनित।
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