ऐश में हम,
उधर जमीर सिर धुने अपना
रूह से जिस्म का यों रूठना नहीं अच्छा
साँस आती रहे,
जाता रहे सुकूँ तिल-तिल
साथ हमराह का यों छूटना नहीं अच्छा
ग़म परिन्दा है,
घर बनाया है तिनका-तिनका-
इस तरह बना है दिल,
यों टूटना नहीं अच्छा
स्रोत- ‘उदासी का ध्रुपद’ संग्रह से साभार अवनीश यादव द्वारा बहता नीर के लिए चयनित।
