चाँद का अपराध बोध

रात का सन्नाटा
सम्पूर्ण निस्तब्धता 
शीतल वायु भी अवसाद फैलाती
ऐसे में पदचाप सहस्त्र पैरों की
दूर तक सुनाई देती रही
चर्र चर्र चर्र चर्र, पट पट पट पट
विस्थापित गृहस्थी लादे साइकिल की घंटी
ट्रिन- ट्रिन, ट्रिन- ट्रिन
 बहुत देर तक बजती रही
शहर के स्थापित गृहस्थों की नींद बार बार टूटती रही
और फिर इस सूनी सड़क पे
बहुत दिनों बाद मद के कुछ घूँट लेकर
रफ़्तार का दीवाना एक
निकला उधर से 
और एकाएक बंद हो गईं सारी आवाज़ें…….


रात का गहराता सन्नाटा
बढ़ती हुई निस्तबधता 
शीतल वायु कुछ और विषैली हुई
ऐसी कि आसमान में चौकीदारी करते 
चाँद की भी आँखें डबडबाने लगें
शीतलता में उसे भी झपकी आने लगे
ऐसे में रेल की पटरी पर 
दिन भर भटकते पैरों की भी साँसे फूलीं 
छोटे छोटे पाँव बेचारे चाँद को देख निंदासे हो गए
थकान मिटाने को वहीं पटरी पर सो गए
और फिर उधर से निकली 
ज़रूरी रसद लिए एक निर्दोष ट्रेन
और ग़ैर ज़रूरी फूलती साँसे शांत हो गईं
वे अब और नहीं फूलेंगी कभी……


सुबह हुई 
सूरज को अपनी गठरी में लादे
वो फिर आगे बढ़ गए
कारवाँ उनका चलता रहा
चाँद अपराधबोध से ग्रस्त
आसमान में लटका रहा. 


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