(माँ के लिए श्रद्धांजलि)
१.
तुम और मैं
नाभिनाल से नहीं जुड़े थे
शायद!
हम जुड़े थे
रीढ़ की हड्डी से
मेरी रीढ़ दरअसल
तुम्हारी ही रीढ़ का विस्तार है
और इसीलिए
यह दर्द भी तुम्हारा ही है
जो अब मुझे मिल गया है
दर्द जो सीधी रीढ़ वालों को होता है शायद
दर्द जो तुम्हारी अनुपस्थिति में भी उपस्थित है
दर्द जिसने मुझे और तुम्हें एकाकार किया हुआ है
दर्द जिसने तुम्हें मुझमे ज़िंदा रखा हुआ है
दर्द जो जीवन का शाश्वत संगीत है
२.
रीढ़ जो आदमी को आदमी बनाती है
रीढ़ जो ऊँची से ऊँची मंज़िल पर और
कठिन से कठिन समय में
आदमी को सीधे खड़ा रहने का हौसला देती है
रीढ़ जो सिर्फ़ होने भर से नहीं होती
रीढ़ जो अक्सर होते हुए भी नहीं होती
रीढ़ जो दुनिया में आदमी की सफलता में
सबसे बढ़ी बाधा भी है और साधन भी
रीढ़ जो संबल है, स्वाभिमान है
रीढ़ जो वीरों का अभिमान है
रीढ़ जो लचीली हो तो सफलता की कुंजी है
रीढ़ जो चापलूसों और चाटुकारों की पूँजी है
रीढ़ जो मुझमे तुम्हारी अस्थिमज्जा से बनी है
रीढ़ जो तुम्हारी मालिश से तनी है
३.
सुना है ! रीढ़ और नाक का कोई सम्बंध है
जिनकी रीढ़ सीधी होती है
उनकी नाक बहुत ऊँची होती है
दुनिया जिनकी रीढ़ नहीं झुका पाती
उनकी नाक पर हमले करती है
और तुम भरपूर लड़ीं अपनी नाक के लिए
अपनी सीधी और तनी हुई रीढ़ के साथ
और यही सिखाया-
जिनकी रीढ़ झुक जाती है
उनकी नाक खुद ब खुद टूटकर गिर जाती है
रीढ़ और नाक
संबंधित विषय – माँ

बहुत अच्छी तरह से रीढ़ और नाक के संबंध को दर्शाया है। शानदार प्रस्तुति