एक दिन-
मेरी दुपहरी नींद
थी परवान पर;
उसी समय यूको बैंक में
पैसे डाल रहे थे पिता !
धान की आधी निराई
छोड़कर खलिहान में;
पैसे डाल रहे थे पिता
बेटे के अगले माह को लेकर
चिंतित थे पिता
और कर रहे थे जुगाड़।
दरअसल बात इतनी थी कि
पिता क्रियाशील था-
जब हम सो रहे थे,
कि पिता कामयाब था-
जब हम सो रहे थे !
और पैसे आ चुके थे पूरे
साथ, पिता के सपने हो गए थे पूरे
उसे मिल गयी थी-
एक निश्चिंतता;
जब हम भटक रहे थे सपने में
और खोज रहे थे जीवन के फलसफे।
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