(1)
आज सूरज के किरणों संग
मैंने एक शब्द मिलाया
उस पर कर्मठ पानी बहाया
और वह खिलकर मुस्कुराने लगी
(2)
पीड़ा पास है
पगड़ंडी हताश है
अनुभूति की महक
श्रम उदास है
अंतर की वेदना में
उर्वरता निढ़ाल है
शुस्ख धरती में
हाल (नमी) नहीं
आकाश में जल नहीं
बंजर पर उगा काश है
(3)
किसी चीज को
कोमलता से स्पर्श करो
बड़ी सहजता से देखो
और निर्मलता से महसूस करो
देखना, तुम्हारा हृदय प्रसन्न
और आत्मा गदगद हो जाएगी
धरती स्वर्ग सी दिखने लगेगी
(4)
कलम में तरुणाई आ गई है
शब्द चटक, धारदार, और यथार्थ हैं
जो मनुष्यता का भावार्थ है
उसे कागज़ पर नहीं
काल के कपाट पर
धरती के सपाट पर लिखो।
(5)
स्याह अंधेरे में चमकती हो
उम्मीद जगाती रौशनी की तरह
सौंदर्य, लहरों पर पतवार खेती
मुस्कुराती, स्वप्न बोती
मेरे अंतर में
जब-तब आ धमकती हो
मैं नित्य आस जोहता, राह तकता
उन्माद में, सोता न जगता
सिर्फ तुम्हे ढूंढता हूँ।
(6)
पूस की ठिठूरती हुई सुबह
एक गौरैया, पीली धूप में
पँख फड़फड़ाई और चहकने लगी
इधर एक वृद्ध का देह अकड़कर
चारपाई पर झूल गया
मृत्यु आग जलाने लगी
(7)
मेरी कविता में थके हुए कंधे हैं
हलधर हैं पर हल नहीं
मिट्टी से भिड़ता श्रम की भोथरी धार है
लेकिन विकृत पैरों में बल नहीं
वही खेत वही पगड़ंडी
उम्मीद भरी सुबह, वही थकी हारी शाम
फ़टी विवाइयाँ लिए कराहता, तनिक नहीं विश्राम
सिर्फ काम…काम…काम
विरासत का साथी(बैल)
गले में बजते घुँघरू
जीवन का सुनाता राग
अलमस्ती में गाता फ़ाग
अब कहाँ वह वसंत
राग भैरवी गाता मंदिर का संत
जैसे अंत हो गया
प्रकृति का कंत सो गया
(8)
ओस नहाई पगड़ंडी पर
भूख की विवशता में किसान
फ़सल को गदराते हुए देखता है
और उसका हृदय हरिया जाता है
(9)
अचानक एक करुण चीख
और आँसुओं में डूबा चेहरा
प्रतिकार के मलीन उम्मीद को
मौन की चेतावनी देता है
और आनंद, पीड़ा से भर जाता है
(10)
सुवह का सुरज
खिड़की पर ठहर गया है
और कमरे में तरुणाई सो रही है
कौन किसके लिए रो रहा है
उत्सव में अब जश्न कहाँ मनता है
बसंत अब फूलों पर नहीं ठहरता
बल्कि कुटिल मुस्कानों के साथ
सुर्ख लाल हो जाता है
(11)
शरीर पाने का सुख
प्रेम के खिलाफ़
एक लम्बी छलांग है
जो स्वप्न-पँख को कतर देती है
और अभिलाशाएँ लहूलुहान होकर
स्याह अंधेरे में चीख पड़ता है
(12)
ऐश्वर्य सुख की लालसा में
फूल को मत चटकाओ
नहीं तो…
अंगुलियाँ लहूलुहान हो जाएंगी
धरती और तपने लगेगी
झूलस जाएगी तुम्हारी आत्मा
और तुम जानवर बन जाओगे
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