एक सितारा जो धूल नहीं बनना चाहता था

वह आया था छूने आकाश की ऊँचाइयों को,
किताबों की खुशबू में अपना वजूद ढूँढने।
पर उसे क्या पता था, कि यहाँ ज्ञान के मंदिरों में,
कलम से ज़्यादा गहरा ज़ख्म ‘जाति’ का नाम देती है।

वह सिर्फ़ एक शोधार्थी नहीं था,
वह एक ‘संभावना’ था, एक दहकता हुआ सूरज,
पर प्रोफेसरों की उन बंद फाइलों और कुटिल मुस्कानों ने,
उसकी मेधा को किश्तों में नीलाम किया।

अक्षर जब ज़हर बन जाएं, और शब्द जब बेड़ियाँ,
तब एक कोमल मन भला कहाँ तक लड़ता!
जहाँ तर्क हार जाएं सत्ता के अहंकार से,
वहाँ एक ‘सितारा’ खामोशी से टूट पड़ता है।

“मेरा जन्म एक घातक हादसा था,”
उसने लिखा था अपनी आखिरी सिसकी में।
पर सच तो यह है कि यह समाज ही एक हादसा है,
जो चमकते हुनर को मिट्टी में मिला देता है।

वह मरकर भी मरा नहीं, वह एक मशाल बन गया,
हर उस बंद द्वार पर, जहाँ भेदभाव का पहरा है।
रोहित की रूह आज भी गलियारों में पूछती है—
“क्या शिक्षा का धर्म सिर्फ़ ऊँच-नीच सिखाना है?”


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