रंगमंच की नई परिभाषा गढ़ती हुई प्रस्तुति है ‘भुखवासी भांड’

bhukhvaasi bhand

कम्युनिटी थिएटर सोसाइटी टोंक एवं एक्स्ट्रा एन आर्गेनाइजेशन द्वारा आयोजित नाट्य समारोह की अंतिम प्रस्तुति ‘भुखवासी भाण्ड’ राजकुमार रजक के निर्देशन में हुई | इससे पूर्व दिन में रंग संवाद का जीवंत आयोजन हुआ | टोंक में रंगमंच को खड़ा करना और रंगसंवाद की परम्परा विकसित करने का श्रेय राजकुमार रजक और उनकी सृजनशील जुझारू टीम को ही जाता है | टोंक आने से पहले मैंने ऐसी रंग अनुभूति की कल्पना नहीं की थी |

भुखवासी भाण्ड फ्रान्ज़ काफ्का की कहानी ‘द हंगर आर्टिस्ट’ तथा प्रफ्फुल राय की बाघ नाच से प्रेरित है | प्रफ्फुल राय की इसी कहानी पर 1989 में फ़िल्म ‘बाघ बहादुर’ का निर्माण बुद्धदेव दासगुप्ता के निर्देशन और पटकथा लेखन के आधार पर हो चुका है | बाघ बहादुर बदलते समय में एक पारंपरिक ग्रामीण कलाकार के सांस्कृतिक विस्थापन की पड़ताल करता है, जब अधिकांश पारंपरिक कला रूपों को विकास के कारण हाशिए पर धकेला जा रहा है। यह प्रस्तुति दिखाती है कि जैसे-जैसे समाज बदलता है, वैसे वैसे कलाकार के अनुभव भी रूपांतरित होते हैं | व्यक्ति की इच्छाएं, उसकी लालसाएं और मानसिक स्थितियों और समाज के बीच एक द्वंदात्मक संबंध है | काफ्का अपनी कहानियों में अतार्किक और उलझन भरी स्थितियों को चित्रित करते हैं जिसमें व्यक्ति असहाय और अकेला महसूस करता है | यह नाटक उन संबंधों के बेतुकेपन को एक हंगर आर्टिस्ट के जरिये भी उजागर करता है | उपवास अपने आप में आत्म से बगावत ही है जिसका उपयोग महात्मा गाँधी ने अपने संघर्ष के हथियार के रूप में किया | वही हथियार भुखवासी भाण्ड इस नाटक में काम में लेता है | राजकुमार रजक ने “काफ्काईन” को भारतीय सन्दर्भ में समझाने के लिए बाघ बहादुर का इस्तेमाल किया है |

ऐसी स्थिति जहाँ इंसान को लगे कि वह किसी अजीब, उलझी और डरावनी दुनिया में फँस गया है, जहाँ नियम समझ से बाहर हैं और निकलने का कोई रास्ता नहीं है। मौजूदा दौर में अगर हम कॉर्पोरेट दुनिया पर नज़र डालें तो समझ आएगा कि किस तरह लक्ष्य प्राप्ति की तलवार हर्र कार्मिक पर लटकती रहती है | तेरह घंटे काम करने के बावजूद एक कमी का अहसास प्रबंधन कार्मिक के मन में बनाये रखता है | ऐसे में उसकी स्वायतता खतरे में होती है और अपने आप को उत्कृष्ट सिद्ध करने के लिए बाध्य होना पड़ता है | सोचिये फिर मेहनतकाश और कलाकार की क्या स्थिति होगी? यह एक क्लान्ति को जन्म देता है, जो उसे धीरे-धीरे भीतर से तोड़ डालती है | यह कहानी कलाकार के समाज से द्वंदात्मक संघर्ष को रेखांकित करती है |

काफ्का का नायक या कहें राजकुमार रजक का नायक अपनी कला से अच्छी ज़िन्दगी गुजरना चाहता है | वह अपनी पारम्परिक कला के बूते गाँव में रहना चाहता है, अपना सौन्दर्य शास्त्र विकसित करना चाहता है लेकिन वहां आये सर्कस के कारण उसका वह अधिकार भी छीन लेता है | विकास का यह मॉडल उसके सपने को तोड़ डालता है | तब वह सर्कस में उपवास का करतब दिखाता है, लेकिन एक समय बाद वह भी अप्रासंगिक हो जाता है | राजकुमार रजक इस क्रूरता को ही समाज को दिखाना चाहते हैं ताकि समाज नए सिरे से सोचे कि अमानवीयता की इस स्थिति से मनुष्यता को बचाया जा जाए |

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नाटक का शिल्प असंगत शैली में बुना गया है | वायलिन और पियानो की धुन और नीले प्रकाश की छाया में दायीं और बायीं ओर से सफ़ेद ग्लोब लिए दो कलाकार मंच पर प्रवेश करते हैं | इसके बाद भुखवासी भाण्ड को एक प्रोसेशन के साथ लाया जाता है, लेकिन वह सफ़ेद एक घेरे में है और उसके साथ दो कलाकार असंगत नृत्य करते चलते हैं | पार्श्व से जो हैमिंग का संगीत गूँज रहा है जो पूरे वातावरण को एक दुखद अनुभूति में लपेट लेता है | यह शुरूआती दृश्य बिम्ब दर्शक के मन को एकाग्र तो करता ही है, साथ ही इसके लिए भी तैयार करता है कि जीवन के संघर्ष का कुछ बड़ा घटित होने वाला है | एक कलाकार जो पिंजरे में बंद चालीस दिन का उपवास कर रहा है | दो सुरक्षा कर्मी उसकी देखभाल कर रहे हैं और यह भी निगरानी कर रहे हैं कि वह कुछ खा तो नहीं रहा | प्रारंभ में दर्शकों के मन में यह कौतुहल पैदा करता है, लेकिन धीरे–धीरे दर्शक आने कम हो जाते हैं | यह बातें भी बनने लगती हैं कि वह जरूर छुप-छुप कर कुछ खा रहा है | चालीस दिन पूरे होने तक वह बहुत कमजोर हो जाता है | एक समय प्रसिद्ध रहने के बाद, लोग धीरे-धीरे उसमें रुचि खो देते हैं और वह एक मनोरंजन के साधन मात्र की तरह भुला दिया जाता है।

चालीस दिन उपवास का रोमांच भी कम होने पर कलाकार पचास दिन उपवास की घोषणा करता है | लेकिन न तो वह सामाजिक उपेक्षा कम नहीं कर पाता है और न ही कला में इतना रोमांच उत्पन्न कर पाता है कि दर्शकों का मनोरंजन हो सके | यानी कलाकार की प्रतिबद्धता भी उसके निरर्थक होने से नहीं बचा पाता | यहाँ तक कि सर्कस वाले भी उसे भूल जाते हैं | एक दिन जब वह देखते हैं तो वह मृत्यु के करीब पहुँच चुका होता है | मृत्यु के करीब, कलाकार कबूल करता है कि उसने इसलिए उपवास किया क्योंकि उसे अपनी पसंद का खाना कभी नहीं मिला, जो उसके जीवन की विडंबना को दर्शाता है। यह कलात्मक जीवन की निराशा, अकेलेपन और सामाजिक अलगाव की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। इस कहानी के जरिये काफ्का पाने जीवन की त्रासद को भी व्यक्त करते हैं |

बहुतेरे पारंपरिक कलाकार ही नहीं वरन फ़िल्मी दुनिया के अनेकों कलाकारों के उदाहरण हमारे सामने हैं जो सामजिक उपेक्षा से उपजे निरर्थकता बोध से कलाकार बेहद अपमानजनक जीवन जीने पर मजबूर होते हैं और दयनीय स्थिति में मरते हैं | यह हमारे निर्मम बनते समाज की ओर संकेत के साथ हमें चेतावनी भी है |

अंत में, कलाकार को दफना दिया जाता है और उसके पिंजरे में एक एक्टिव ‘पैंथर’ को रखा जाता है, जो कलाकार के “मृत” और “निष्क्रिय” उपवास की तुलना में जीवन और जीवंतता का प्रतीक है। कहानी कलाकार और समाज के बीच के संघर्ष को दर्शाती है, जहाँ समाज केवल मनोरंजन चाहता है, जबकि कलाकार अपनी कला की शुद्धता एवं अस्तित्त्व के लिए एवं खुद को मिटा देता है।
नाटक के दूसरे भाग में बघेरू भाण्ड नायक है जो एक पारंपरिक बहुरूपी कलाकार है | लोग उसकी कला में अधिक रूचि नहीं लेते अतः वह अपनी कला को सम्मान दिलाने तथा ज्यादा लोगों को दिखाने के लिए सर्कस में भर्ती हो जाता है और वहां असली बाघ से असली मुठभेड़ करता है | यह बिडंबना ही है कि असली बाघ को सर्कस वाले भरपूर मांस देते हैं, वहीँ एक कलाकार अपनी पसंद के खाने और गाँव में अच्छा जीवन व्यतीत करने के लिए बाघ से लड़ता है | बाघ उसे मार देता है | इस समाज का नया मॉडल और कला के प्रति उपेक्षा के विरुद्ध हमारी पारंपरिक कला को बचाने और कलाकार के सम्मान के लिए एक कलाकार जान भी दे देता है | तंत्र उसे विस्मृत कर देता है | नाटक को देखते हुए मुझे हरिशंकर परसाई की कहानी ‘भोलाराम का जीव’ याद आती रही | वहां महज अस्तित्व का संकट और नौकरशाही की अकर्मण्यता थी लेकिन यह नाटक कलाकार की पहचान के संकट और बेहतर जीवन की आकांक्षा को भी रेखांकित करता है | हमारे समाज में बहुरुपी कलाकारों की दशा जगजाहिर है।

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नाटक का शिल्प नवीनता और निर्देशकीय कल्पना को दर्शाता है | चितरंजन नामा, मोहित वैष्णव और आफ़ताब संगीत और प्रकाश अभिकल्पना से उनकी परिकल्पना को गहराई प्रदान करते हैं | शुभम मेघवंशी, अवधेश कुमार, कारण कुमार, आशीष धाप, मणिकांत लक्षकार, अदनान खान, आशीष चावला और विजय लक्ष्मी अपने अभिनय से नाटक के दृश्य बिम्बों को अर्थवत्ता प्रदान करते हैं | असंगत शैली में वाचिक से अधिक आंगिक अभिनय में पारंगत होना जरूरी है | पद संचालन, भावाभिव्यक्ति से वे दर्शकों को बाँधने में कायम रहते हैं | यह प्रस्तुति दो घन्टे से अधिक की थी | एक सीमा के बाद कलात्मक अभिनय का आधिक्य दर्शक को मानसिक शिथिलता की ओर धकेलने लगता है अतः दृश्यों के जरूरी ठहराव को प्रभावित किये बिना प्रस्तुति की अवधि को कम किया जाना जरूरी है ताकि नाटक की गति भी बढे | इसके बावजूद भी रंगमंच की नयी परिभाषा गढ़ती हुई प्रस्तुति है भुखवासी भाण्ड |

टोंक जैसे छोटे शहर में राजकुमार रजक के स्तरीय रंगमंच को स्थापित की पहल का स्वागत किया जाना चाहिए | बनते हुए समाज और कला के प्रति हमारी दृष्टि को इंगित करते हुए, हमारा ध्यान सामाजिक दायित्व बोध की ले जाने की ‘रजकायन’ कला कहूँगा जिसमें वे रंगमंच के माध्यम से हमारी चेतना को जागृत करने का प्रयास करते हैं | इसे रंगमंच से परिवर्तन का टूल भी समझा जा सकता है |

कम्यूनिटी थिएटर टोंक सोसायटी एवं एक्स्ट्रा एन ऑर्गनाइजेशन द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय नाट्य समारोह में मंचित अन्य नाटकों की कुछ और यादगार तस्वीरें। मंच पर बिखरे जज्बात और कलाकारों की मेहनत इन पलों में साफ नजर आ रही है।

dackghar

डाकघर

nadi pyasi thee

नदी प्यासी थी

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