
सौरभ अनंत की रंग यात्रा से पहले प्रयोगात्मक रंगमंच और शिक्षण के अंतर्संबंध के ऐतिहासिक परिपेक्ष्य को समझना जरूरी है, क्योंकि सौरव अनंत तो इस अभियान में बहुत बाद में जुड़े । 1988 के आसपास राष्ट्रीय स्तर पर यह महसूस किया गया कि बच्चों को रंगमंच से कैसे जोड़ा जाए । इसके साथ प्रश्न यह भी था कि उनके समझ के स्तर को बढाने और समझाने के तरीके को रोचक बनाने के लिए क्यों न शिक्षा के लिए रंगमंच का इस्तेमाल किया जाए । इसी पर विचार मंथन करने के बाद अक्टूबर 1989 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा थिएटर इन एजुकेशन का प्रयोग का आगाज़ बेरी जॉन द्वारा किया । पिछले 25 सालों से यह रंग अभियान चल रहा है । बेरी जॉन ने वयस्क कलाकारों द्वारा बच्चों के नाटकों की प्रस्तुति से इस अभियान की शुरुआत की । रंगमंच के माध्यम से स्वयं के व्यक्तित्व का विकास कैसे किया जाए, इस पर केन्द्रित किया गया । बच्चों के साथ काम करते हुए उन्हें समझना, उनके मनोविज्ञान को समझना और बच्चों के परफॉर्म करना, यही ध्येय था । बच्चों की भूमिका करते हुए चीजों को समझने की कोशिश जारी रही ।
सौरभ अनंत ने भोपाल के भारत भवन से जुड़ कर संगीत, नृत्य, रंगमंच, चित्र एवं मूर्तिकला की परम्पराओं और नवाचारों से उन्होंने अपने आप को समृद्ध किया है। वे कवि हैं तथा फाइन आर्ट्स के स्नातक हैं। अतः फलस्वरूप भारतीय नाट्य परंपरा में प्रयोगधर्मिता का समावेश करते हुए ऐसे रंगकर्म की खोज की ओर अग्रसर हुए जिसमें हमारे समय के सामाजिक सरोकारों के साथ गहरा सौंदर्यबोध पूरी संवेदनशीलता के साथ प्रकट हो। दृश्य, श्रव्य तथा प्रदर्शनकारी कलाओं में स्वाभाविक रुचि होने के कारण उनके भीतर वैचारिकता तथा सौंदर्यबोध का सहज विकास हुआ। यही कारण है कि अछूते सामाजिक विषयों की अभिव्यक्ति गहरी संवेदनशीलता और मनोवैज्ञानिक अध्ययन के साथ नाट्य प्रस्तुतियों में देखने को मिलता है।
भोपाल में उन्होंने 2011 में विहान ड्रामा वर्क्स की स्थापना की। भारतीय नाट्य परंपरा, लोकशैली और आधुनिक सामाजिक सरोकारों को मिलाकर रंग-निर्देशन करने के लिए जाने जाते हैं।
2006 में सौरभ अनंत जापानी उपन्यासकार तेत्सुको कुरोयानागी का आत्मकथात्मक उपन्यास ‘तोत्तोचान’ के हिंदी अनुवाद से गुजरते हुए तो बरबस शिक्षा पद्धति की वैश्विक समस्या उनके जेहन में उभर आई । तोत्तोचान का अर्थ है–खिड़की में खड़ी एक नन्ही लड़की । सौरभ भी भारत की शिक्षा पद्धति से संतुष्ट नहीं थे। उपन्यास में एक लड़की तोत्तो को श्री सोसाकू कोबायाशी से पढने का अवसर मिला जो रेल के डिब्बे में बच्चों को पढ़ाते थे । कोबायाशी अपने बच्चों को गंदे कपडे पहन कर आने के लिए कहते थे ताकि वे मिटटी में निसंकोच खेल सकें । तेत्सुको अपनी किताब में लिखती हैं कि” मैं ज्यादा से ज्यादा लोगों को कोबायाशी के पढ़ाने के अनूठे प्रयोगों के बारे में बताना चाहती हूँ ।” सौरभ अनंत ने 2017 तक इस उपन्यास को नाट्य रूपांतरण कर दिया। इसमें हेमंत देव्लेकर की बाल कविता और जापानी लोक कथा का रूपांतरण भी इस्तेमाल किया । इस तरह वे यह स्थापित करने का प्रयास करते हैं कि अच्छे शिक्षक और अच्छे स्कूल विवेकवान मनुष्य बनाते हैं जो युद्ध और विध्वंस की संभावनाओं को कम कर सकते हैं । इसका मंचन एक बार फिर हमारी शिक्षण पद्धति पर एक सवालिया निशान खड़ा करती है।
उन्होंने ‘बनारस के विमल चन्द्र पाण्डेय की ‘जैक जैक जैक रूदाद ए नीरस प्रेम कहानी पर आधारित नाटक ‘प्रेम पतंगा’ का निर्देशन किया। ‘प्रेम पतंगा’ मैंने 29 दिसम्बर,23 को जवाहर कला केंद्र जयपुर में देखा। यह कहानी ऐसे युवाओं की है जो छोटे शहर या कस्बों से महानगर में पढने आते हैं। छोटे शहर के संकीर्ण दायरे से निकल शहरी खुलेपन की बयार उनके मन में प्रेम की हिलोरें पैदा करती हैं। यहीं से शुरू द्वन्द को सौरभ ने बड़े रोचक ढंग से नाटकीयता प्रदान करते हुए संवेदनशीलता से इस नाटक में प्रस्तुत किया।
यद्द्पि शिक्षित वर्ग की संख्या में उत्साहजनक वृद्धि हुई है लेकिन मौजूदा दौर की चुनौतियों से लड़ने के लिए न केवल शिक्षित होना पर्याप्त है बल्कि व्यावहारिक ज्ञान भी होना जरूरी है । बहुतेरे बच्चे ऐसे होते हैं जो सिर्फ कोर्स पर फोकस करते हैं। परिणामतः वे जीवन में पूरी तरह सफल नहीं हो पाते। जीवन की चुनौतियों के हल किताब में नहीं मिलते, उनके सूत्र बाहरी दुनिया में और प्रकृति के संसर्ग में हैं। यह एक उदाहरण उनकी दृष्टि और प्रतिबद्धता के सूत्र हमारे सामने रख देता है । वैलेंटाइन डे यानी प्रेम का दिन कहे जाने वाले दिन जवाहर कला केंद्र के कृष्णायण में हिंदी के प्रसिद्द कवि श्रीकांत वर्मा की कहानी पर आधारित एवं सौरभ अनंत द्वारा नाट्य रूपान्तरित एवं निर्देशित नाटक ‘दुपहर’ का मंचन रंग निर्देशक संदीप मदान की स्मृति में नुपुर संस्था की ओर से किया गया।
यह नाटक दो ऐसे लड़कों बिगुल और कप्तान की है जो एक दुपहर क्लास बंक करके चले आते हैं । बिगुल सीधा-सादा है और माँ-पिता के निर्देशों से चलता है, उसका लक्ष्य पढ़ लिख कर बड़ा अधिकारी बनना है | लेकिन व्यावाहारिक ज्ञान के मामले में शून्य है । दूसरा छात्र कप्तान है जिसे पढ़ाई से कोई मतलब नहीं है और दो साल फेल भी हो चुका है, लेकिन दुनियादारी का ज्ञान उसे भरपूर है । बिगुल ने नदी कभी नहीं देखी थी अतः वह कप्तान के साथ नदी देखने आया है। नदी तक पहुँचने में बाग़, कब्रिस्थान और पहाड़ आते हैं। प्रकृति को इतनी नजदीकी से बिगुल ने कभी नहीं देखा था । उसके लिए यह दुनिया कौतुहल पूर्ण थी।
सौरभ अनंत द्वारा नाट्य रूपान्तरित एवं निर्देशित इस नाटक में हेमंत देवलेकर आकर दर्शकों के साथ मिल कर कुछ एक्सरसाइज करते हैं जो दर्शकों को जोड़ने का प्रयास कहा जा सकता है। पूरी प्रस्तुति इनट्रेक्टिव, पार्टिसिपेटरी और इंटिमेट शैली की रही । बंक करके जाना और लौटने की प्रक्रिया में जीवन के व्यावाहारिक सूत्र कप्तान बिगुल को बताता चलता है, जो उसकी शंकाओं को दूर करने में सहायक होते हैं ।
यहाँ गीत की पंक्तियाँ पार्श्व से गूंजती हैं-
एक ही है आसमां
एक सी कहानी है
उड़ रहे हैं ख्वाब में हम
ख्वाब ही ज़ुबानी है
बगीचे से फल तोड़ना, स्कूल बंक करते हुए किसी के देख लेने का डर, कब्रिस्तान से गुजरना, फिर नाव की यात्रा और अंत में नदीके पानी में अठखेलियाँ करते हुए जो दृश्य बिम्ब सौरभ बनाते हैं वे बहुत सुन्दर और मन को छू लेने वाले थे। स्कूल के दिनों के अनुभवों का पुनर्सृजन की एक बेहतर मिसाल थी जो दर्शकों को उनके बचपन में ले जाने में कामयाब होती है। कोई सेट नहीं, दो बसते और कुछ कॉपी किताब, ये महज प्रोप इस्तेमाल करते हुए कितनी गूढ़ बातें सहजता से बच्चों ही नहीं वरन बड़ों तक को समझाते हुए निकल जाते हैं। दो दृश्यों की चर्चा यहाँ न करूं तो बात अधूरी है। एक दृश्य वह है जिसमें पत्थर को पानी पर तैराने का है जिसमें होड़ लगती है कि कौन दूर तक तैरा सकता है। बचपन में हम भी मटके के पतले टुकड़े तैराते थे। दूसरा अंतिम दृश्य जिसमें कप्तान नदी में दुबकी लगा कर दूर निकल जाता है | बिगुल उसके देर तक पानी से बाहर न आने पर व्यथित होकर रो पड़ता है | वह दृश्य निश्छल स्नेह का प्रतिबिम्ब बन जाता है |
नाटक में निरंजन कार्तिक के गीत संगीत का प्रयोग नाटक की मूल भावना को अनुप्राणित करते हैं। एक और गीत है –
हम चले कहाँ ?
हम भी जानें ना
रास्ते हैं खुले, खुला है
पूरा आसमान
निसंदेह नाटक को शुभम कटियार और रुद्राक्ष भायरे के श्रेष्ठ अभिनय ने सिद्धि तक पहुँचाया । माइम से चीजों को और हाव भावों को प्रकट करने का अनुपम उदाहरण उन्होंने पेश किया । कथानक के पात्र बच्चों के मनोविज्ञान को आत्मसात करके पुनर्सृजन करने की निर्देह्सक की परिकल्पना पर वे खरे उतरे, ऐसा मुझे प्रतीत हुआ। यही वजह थी कि न केवल बच्चों ने बल्कि हर उम्र के दर्शक आनंदित हुए। संगीत और प्रकाश अभिकल्पना सौरभ अनंत का ही था । जब लेखक, निर्देशक और संगीत –प्रकाश अभिकल्पक एक ही हो तो प्रस्तुति में एक प्रभावी लय बनती है।श्वेता केतकर ने कलाकारों का अभिनय प्रशिक्षण, मेकअप, वस्त्र सज्जा और माउथ ऑर्गन बजाने जैसी भूमिकाओं के निर्वाह से नाटक को समृद्ध किया। अंश जोशी का गिटार वादन और गीतों का गायन भी प्रभावी था ।

मै सौभाग्यशाली हूँ की विहान ड्रामा वर्क्स के परिवार से जुड़ा हूँ।
शुक्रिया सर इतनी अच्छी समीक्षा करने के लिए 🌻
यह पढ़कर बहुत ही अच्छा लगा विहान मैं आकर मैने बहुत कुछ सीखा है और मैं खुशकिस्मत हूं कि मैं हर एक नाटक का हिस्सा रहा हूं अपने गुरु सौरभ सर को धन्यवाद देता हु और धन्यवाद राघवेन्द्र जी सुंदर लेख के लिए🙏
विहान और सौरभ सर की रंग यात्रा बेशक ही प्रेरणा लेने वाली है और जिस तरह वो लगातार बच्चों के साथ और बच्चों के लिए नाट्य प्रयोग कर रहे हैं वो सीखने के लिए बड़ा स्कूल है, ना सिर्फ़ नाट्यकला सीखने के लिए बल्कि एक बेहतर मनुष्य बनने के लिए भी। बहुत गर्व की बात है कि मैं विहान का हिस्सा हूँ। धन्यवाद राघवेंद्र जी दुपहर पर और विहान की यात्रा पर इतना सुंदर लेख साझा करने के लिए।🙏
बहुत आभार Raghvendra Rawat सर की मंचन के दौरान आप दर्शक दीर्घा में थे। ये हमारे लिए बहुत सौभाग्य की बात है की आपके जैसे आलोचक, और विचारक के सामने प्रस्तुति देने का अवसर मिला। विहान में ये हमेशा से ही सीखने को मिला है की कैसे रंगमंच और शिक्षा एक साथ यात्रा कर सकते हैं। दुपहर जैसी कहानी जो मूल रूप में एक अनुभवनात्मक कथा मात्र है, पर सौरभ अनंत सर को उसमे शिक्षा के तत्वों को बुनते हमने हमारे रिहर्सल हॉल में देखा है। और निरंतर हर मंचन के साथ इसमें शिक्षा के नए आयाम जुड़ते चले जाते हैं , जो हमे भी विषय के और करीब लाता है। इस नाटक ने मंच का हिस्सा होना अपने आप में बड़ा अनुभव है!
शुक्रिया Sourabh Anant सर
शुक्रिया Vihaan Drama Works 🌸
मैं खुद को बहुत भाग्यशाली मानता हूँ कि मुझे Vihaan का हिस्सा बनकर इतना सुंदर अनुभव मिला। सौरभ अनंत सर का मार्गदर्शन और मेहनत सच में प्रेरणादायक है। उनसे बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। 🌻✨
‘दुपहर नाटक’ सचमुच एक प्रेरणादायक नाटक है जो बचपन की याद के साथ सीख भी देता, और बच्चो को बाहरी दुनिया दिखाता है की सब कुछ किताबों मे नहीं होता, किताब से बाहर भी एक दुनिया है जो कप्तान, बिगुल दिखाता है।
कला विचारों, भावनाओं और इच्छाओं की रचनात्मक अभिव्यक्ति है,
सौरभ सर और विहान की यात्रा बहुत प्रेरणादायक है जो लगातार बच्चो के लिए नाटक, वर्कशॉप कर रहे, जो बच्चो को नाटक के साथ – साथ जीवन को समझने और जीने मे की प्रेरणा देता है! मै भाग्यशाली हूं की विहान का हिस्सा हूं, शुक्रिया राघवेंद्र सर 🙏🏻सुन्दर समीक्षा के लिए।
विहान के संकल्प बीज़ को इस तरह प्रस्फुटित होते, बढ़ते देखना.. उसे जीना, उसके साथ स्वयं को जानना, खोजना और निरंतर उस असीम तक पहुंचने की यात्रा में बने रहना..ये सब कुछ ही अविस्मरणीय है और रहेगा, क्यूंकि हमेशा हर दिन, हर नाटक, हर रियाज़, हर कार्यशाला, हर अनुभूति यहां पर उतने ही कालातत्व व उतने ही अपनत्व में उतरने की सीख देती रही है. हमेशा ही साभार है विहान की जड़ों का, हमारे मेंटर्स का.. इस तरह ये सारी स्मृतियाँ हममें पिरोने के लिए Sourabh Anant Hemant Deolekar Shweta Ketkar 🫶 💫
इस सुन्दर समीक्षा का ह्रदयाभार Raghvendra Rawat सर 🙏 😇