
अगर आप अभिनेता हैं, नृतक हैं, वादक हैं गायक हैं, यानी कला से सरोकार है तो जो तस्वीर आप देख रहे हैं वह आपको रुला देगी। जी हाँ ! आप ठीक समझ रहे हैं, यह मृत प्रायः होते रवीन्द्र मंच की तस्वीर ही है, जहाँ से आपने कला एवं संस्कृति की दुनिया में उड़ान भरी होगी। सैकड़ों नाम मेरे ज़ेहन में इस बाबत उभर आते हैं।
पूरे देश में रवीन्द्र प्रेक्षागृहों का निर्माण और क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्रों की स्थापना छठे दशक में हुई, जिससे नए युवाओं को रंगमंच से जुड़ने की प्रेरणा और प्रशिक्षण दोनों मिले। 15 अगस्त 1963 को रवीन्द्र रंगमंच का उद्घाटन हुमायूँ कबीर, तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री वैज्ञानिक अनुसंधान एवं सांस्कृतिक कार्य के हाथों जयपुर में हो चुका था। उस दिन सत्यदेव दुबे द्वारा निर्देशित नोबेल पुरस्कार विजेता नाटकार हेराल्ड पिंटर द्वारा लिखित नाटक केयर टेकर का मंचन हुआ। तत्कालीन समय में इस नाटक की विश्व में काफी शोहरत हो चुकी थी।
रवीन्द्र मंच परिसर में 690 की क्षमता का मुख्य प्रेक्षागृह तथा एक मिनी थिएटर 120 की क्षमता, दो रिहर्सल हॉल, ग्रीन रूम, दो प्रबंधक कक्ष सहित तलघर आदि के साथ तैयार हुआ था। ध्वनि व्यवस्था दिल्ली की फिलिप्स एवं जयपुर की फिलिप्स निक्स फर्म द्वारा किया गया था। इस भवन की अभिकल्पना सार्वजनिक निर्माण विभाग के मुख्य वास्तुविद परमानन्द गजरिया द्वारा तैयार की गई जिसे इसी विभाग के अधिशासी अभियंता टी. एन. सेठ और सहायक अभियंता हरिहर नाथ पारीक के निर्देशन में हुए निर्माण ने साकार किया। निर्माण के दौरान नाटककार-निर्देशक रणवीर सिंह ने आवश्यक सुझाव भी निर्माण में दिए। 1962-1972 तक कर्मवीर माथुर रवीन्द्र मंच के प्रशासनिक अधिकारी रहे। कहते हैं उनके कार्यकाल के दौरान कलाकारों और मंच के कर्मचारियों के बीच अच्छा समन्वय था। कालांतर में आठवें दशक में अल्काज़ी की अभिकल्पना के अनुरूप 2500 की क्षमता का ओपन एयर थिएटर का निर्माण हुआ। इसकी प्रकाश व्यवस्था आई. एफ. एक्स के साउंड इंचार्ज बंगाल के जाफरी ने की। रवीन्द्र मंच के एंट्रेंस फोयर में वरिष्ठ कलाकार मीनाक्षी हूजा का सात धातु से निर्मित स्कल्पचर लगाई गई।
गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर की कलाकृति ब्रोंज रिलीफ शैली में बनाई गई है। ” ओपन एयर थिएटर की जगह महज बरामदा था जिस पर मेहन्दी हसन, रूना लैला और सितारा देवी अपनी प्रतिभा बिखेर चुके थे। मुख्य प्रेक्षागृह में देश के नामचीन कलाकार सितारा देवी, रोशन कुमारी, बिरजू महाराज, सोनल मानसिंह, भीमसेन जोशी, किशोरी अमोनकर, डागर बंधु, गिरिजा देवी, बेग़म अख्तर, साबरी ब्रदर्स, लक्ष्मण भट्ट तेलंग, अहमद हुसैन-मुहम्मद हुसैन, विश्व मोहन भट्ट, जैसी हस्तियाँ प्रस्तुति दे चुकी हैं। बी. वी. कारंत, मोहन राकेश और हबीब तनवीर यहाँ के रंगमंच के साक्षी रह चुके हैं। ओम शिवपुरी, सुधा शिवपुरी, मोहन महर्षि, रणवीर सिंह, भानु भारती, भारत रत्न भार्गव, पिंचू कपूर, हिम्मत सिंह, इला अरुण, रमा पाण्डेय, एस. वासुदेव, एच. पी. सक्सेना, सरताज माथुर, साबिर खान, रवि चतुर्वेदी, इरफ़ान खान, नरेन्द्र गुप्ता, सुनील सिन्हा, जयरूप जीवन, रवि झाँकल, हरीश मखीजा, दौलत वैद, स्मिता बंसल, ऋषिकेश शर्मा, सारंगी वादक मोईनुद्दीन खान, कुंदन लाल गंगानी, मधु भट्ट, प्रेरणा श्रीमाली और धीरज सरना जैसे अनेकों प्रतिभाशाली कलाकार इस मंच ने दिए जिन्होंने जयपुर का नाम देश-विदेश में रोशन किया। 1963 में बने इस प्रतिष्ठित सांस्कृतिक केंद्र की महज 63 साल में ही ऐसी दुर्दशा हो जायेगी, इसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की होगी। 1985 से पहले इस पर सरकार का नियंत्रण था जो बाद में रवीन्द्र मंच सोसाइटी के हाथों में यह सोच कर दिया होगा ताकि कला और संस्कृति की स्वायत्तता बनी रहे और कला एवं संस्कृति का संरक्षण एवं विकास हो, लेकिन हकीक़त में वहां प्रबंधन सरकार के रहमोकरम पर है, सोसाइटी नाम मात्र की है।
हाल ही में 18 नवंबर को हमने जयपुर का 297वां स्थापना दिवस मनाया। सोशल मीडिया पर शहर की ऐतिहासिक इमारतों और बाजारों के चित्र साझा किये और जयपुर के गौरवशाली इतिहास की चर्चा की। लेकिन किसी ने इस ऐतिहासिक शहर के बदहाल होने की पीड़ा व्यक्त नहीं की।
क्या गुलाबी शहर सचमुच अब भी गुलाबी है या इसकी धमनियों में जहर घोल दिया गया है। किसी भी शहर की पहचान वहां की कला, साहित्य और संस्कृति से होती है। बात पुरानी है किन्तु यूरोपीय देशों में कला एवं संस्कृति का महत्त्व है, उसे भारत के परिदृश्य से मिलान कर सकेंगे। यहाँ मैं एक वाकया उद्धृत करना चाहूँगा। जुलाई,1969 में बी. वी. कारंत एक सरकारी आयोजन में यूरोप के सात देशों के रंगमंच का अध्ययन करने गए, इनमें बर्लिन, बुडापेस्ट, बेलग्रेड, बुखारेस्ट, रोमानिया और बुल्गारिया शामिल थे। कारंत बताते हैं कि हर राजधानी में विदेशी अतिथियों के लिए प्रचार विभाग के लोग कुछ साहित्य हमें थमा देते थे। इनमें लिखा होता –“ हमारे यहाँ के थिएटर में देश का जिंदा नागरिक बसता है, या फिर थिएटर में ही हमारे राष्ट्र को अभिव्यक्ति मिलती है,। जर्मनी के नागरिक की नागरिकता थिएटर से शुरू होती है। हंगरी का प्रत्येक व्यक्ति एक अभिनेता है। युगोस्लाविया आपको चुनौती देता है कि आप वहां के नागरिक और अभिनेता को अलग-अलग पहचानें, बुल्गारिया में एक भी ऐसा नागरिक नहीं मिलेगा जो जीवन में एक बार भी रंगमंच पर न चढ़ा हो, वगैहरा वगैरहा। तब बर्लिन की आबादी 12 लाख थी और वहां 15 नियमित थिएटर थे, और दस लाख वाले बुडापेस्ट में 18 थिएटर थे। और जयपुर की आबादी 6 लाख थी और एक मात्र थिएटर रवीन्द्र मंच था। आज वही थिएटर खून के आंसू रो रहा है। जहाँ कभी रौनक हुआ करती थी, वहां वीरानी छाई हुई है। परिसर अन्धकार में डूबा रहता है। इसलिए कहना पड़ रहा है कि शहर की पहचान खो रही है। एम.आई रोड से आने वाले तेज रफ़्तार ट्रैफिक के कारण मंच की ओर जाना ही जोखिम भरा होता है। मंच परिसर में कुत्तों और गन्दगी का आलम रहता है। बहुत कम नाट्य प्रदर्शन वहां होते हैं क्योंकि वहां सुविधाओं का विस्तार तो दूर रख-रखाव ही ठीक से नहीं किया जा रहा। मुख्य प्रेक्षागृह में कुछ कुर्सियां टूटी हुई हैं, कामचलाऊ लाइट्स हैं, शो करना है तो शेष आपको खुद ही इंतजाम करना पड़ेगा। साउंड सिस्टम और लाइट्स के रख-रखाव और संचालन के लिए स्टाफ ही नहीं है हॉल में चूहे घूमते नज़र आ सकते हैं। कैफेटेरिया नहीं है। ओपन एयर थिएटर के हालात और भी बुरे हैं। वहां स्थित लाइट्स खराब हो हुकी हैं। रख-रखाव नहीं हो रहा है अतः कायक्रम भी नहीं हो पा रहे हैं।
रिहर्सल के दौरान चाय तक बाहर से मंगानी पड़ती है और पीने के पानी की समुचित व्यवस्था नहीं है। कलाकारों के टॉयलेट्स की स्थिति भी अच्छी नहीं है। मिनी थिएटर में न साउंड प्रूफिंग है और न पर्याप्त लाइट्स। ऐसे नाट्य मंचन की महज खानापूर्ति ही होती है। क्योंकि कोई नियमित स्टाफ नहीं है अतः मुख्य प्रेक्षागृह को खोला नहीं जाता ताकि धुप और खुली हवा अन्दर जा सके, परिणामतः हॉल में अजीब से गंध पसरी रहती है। मुख्य वजह है कि कोई स्थाई प्रबंधक नहीं है। वहां किसी योग्य प्रशासक को लगाया जाए जिसकी कला के उत्थान में रुचि न कि उसे जो मजबूरी में रवीन्द्र मंच पर पदस्थापित हो। फिलहाल राज्य सरकार ने अतिरिक्त कार्यभार संयुक्त सचिव को दे रखा है जिन पर ओःले से ही कई अन्य जिम्मेदारियां हैं। जरूरी है नियमित प्रशासनिक अधिकारी और कुछ सुपोर्टिंग स्टाफ वहां नियुक्त हो। ताकि नियमित रूप से केंद्र का संचालन और सांस्कृतिक गतिविधियों में आने वाली दिक्कतों का निपटारा हो सके। वहां किसी योग्य प्रशासक को लगाया जाए जिसकी कला के उत्थान में रुचि न कि उसे जो मजबूरी में रवीन्द्र मंच पर पदस्थापित हो। यह समझ से परे है कि नाहरगढ़ और झालाना में वन्य अभयारण्य स्थापित होने के बाद शहर के बीचों बीच चिड़िया घर क्यों अब तक रखा हुआ है ? क्यों न चिड़िया घर के पिछवाड़े से सीढ़ी, एंट्री मंच को दी जाए तथा भूमिगत पार्किंग तरफ सिर्फ निकास द्वार हो।
बेहतर होगा चिड़ियाघर की भूमि कुछ मंच और कुछ यातायात को सुगम करने के लिए दे दी जानी चाहिए। एक कला संकुल परिसर के रूप में यह स्थान विकसित किया जाना चाहिए। जहाँ एक मुख्य प्रेक्षागृह, दो मिनी ऑडिटोरियम, 4-5 रिहर्सल हाल, कैफेटेरिया, लाइब्रेरी, आर्ट गैलरी, बड़ी एवं व्यवस्थित पार्किंग, प्रबंधन विभाग, 4-5 स्टोर्स, जेनरेटर रूम, लिफ्ट आदि सुविधाएं हों। ललित कला अकादमी भी यहाँ शिफ्ट कर दी जाए। जिसमें जवाहर कला केंद्र से बहुत कम किराया होने के बावजूद वहां नाट्य मंचन न होना दुखद है। साठ साल के दस्तावेज मंच में उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि कोई दस्तावेजीकरण किया ही नहीं गया।
अब अधिकांश रंगकर्मियों ने मंच की हालत से व्यथित होकर जवाहर कला केन्द्र और राजस्थान इंटरनेशनल सेन्टर की ओर रुख कर लिया है। मंच की सिल्वर जुबली और स्वर्ण जयंती मनाने के बाद वरिष्ठ नागरिक की उपेक्षा यह ऐतिहासिक विरासत झेल रही है। यही हॉल प्रदेस के अन्य प्रेक्षागृहों का है। भीलवाड़ा जैसे शहर में टाउन हॉल है जो नगर निगम की देखरेख में है। वहां वरिष्ठ नाट्य निर्देशक गोपाल आचार्य के नेतृत्व में रसधारा नाट्य समूह विगत दो दशक से नाटय समारोह सालाना आयोजित कर रहा है, 500 दर्शक नियमित नाटक देखने आते हैं। लेकिन टाउन हॉल में न तो नाटक के लाइट्स हैं और न ही विंग्स हैं। कोई कैफेटेरिया नहीं है। कुर्सियां भी माशा अल्लाह हैं। अब प्रशासन ने मंच पर एलइडी स्क्रीन लगा दिया है। अर्थात नाटक भले न हो लेकिन सरकारी कार्यक्रम प्राथमिकता रहेगी। जोधपुर का जयनारायण व्यास प्रेक्षागृह में भी नाटक नहीं हो पा रहे हैं। हॉल ही में भारंगम वहां न होकर एन मौके पर अन्यत्र करना पड़ा। टोंक में मात्र एक ऑडिटोरियम है जो कृषि उपज मंडी के अधीन है। चार घंटे का किराया पैंतीस हज़ार है, ऐसे में कोई कैसे नाटक करे ? भरतपुर में हमने 1986 में टाउन हॉल को प्रशासन को कह कर खुलवाया क्योंकि वह जलदाय विभाग का गोदाम बना हुआ था। अब सुनने में आ रहा है कि उसे रेस्टोरेंट हेतु लीज पर दिया जा रहा है। यानी सरकार की प्राथमिकता में संस्कृति पर्यटन से अधिक नहीं है। पधारो म्हारे देश और किले-बाबड़ी देखो, और जाओ। बीकानेर के रवीन्द्र मंच का किराया 28000रूपये है, किसी नाट्य संस्था के लिए इतना किराया चुका मंचन कैसे संभव है ? वहां लाइट्स की व्यवस्था भी उचित नहीं है। जयपुर के बाद साहित्य और संस्कृति के मामले में बीकानेर बहुत समृद्ध विरासत लिए है। ऐसे में वहां सरकार और सक्षम नागरिकों को इस बावत पहल करनी चाहिए।
प्रशासन की नींद नहीं खुल रही है, कितने ही ज्ञापन दीजिए, सोशल मीडिया पर लिखिए, कोई संज्ञान नहीं लेता, कार्यवाही तो दूर की बात है। क्या हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर के प्रति सचेत हैं ? मैं कहूँगा नहीं। ऐसा लगता है कि यह शहर सोया हुआ है या भौतिकवाद और विकास की अंधी दौड़ में शामिल हो गया है।
यह समझ से परे है कि नाहरगढ़ और झालाना में वन्य अभयारण्य स्थापित होने के बाद शहर के बीचों बीच चिड़िया घर क्यों अब तक रखा हुआ है ? क्यों न चिड़िया घर के पिछवाड़े से सीधी एंट्री मंच को दी जाए तथा भूमिगत पार्किंग की तरफ सिर्फ निकास द्वार हो। बेहतर होगा चिड़ियाघर की भूमि कुछ मंच और कुछ यातायात को सुगम करने के लिए दे दी जानी चाहिए। वहां किसी योग्य प्रशासक को लगाया जाए जिसकी कला के उत्थान में रुचि हो, न कि उसे जो मजबूरी में रवीन्द्र मंच पर पदस्थापित हो। जवाहर कला केंद्र से बहुत कम किराया होने के बावजूद वहां नाट्य मंचन न होना दुखद है। रंगकर्मियों का दायित्व है कि वहां अच्छे नाटकों का मंचन करें तो दर्शक भी आयेंगे। हम शहर वासियों का दायित्व है कि जागें और इस कार्य के लिए आवाज़ बुलंद करें।
अब समय आ गया है कि जयपुर में कला संकुल की स्थापना हो। कितने ही विशेषज्ञ लोग शहर और देश में हैं जो इस स्थिती से उबरने में मदद कर सकते हैं, सरकार उनकी मदद ले सकती है। सरकार को चाहिए रवीन्द्र मंच जैसी ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के लिए वरिष्ठ रंग निर्देशकों और तकनीकी विशेषज्ञों की प्रभावी कमेटी बना कर आवश्यक कदम उठाये। अब समाज को यह जिम्मेदारी उठानी पडेगी। समाज के संपन्न वर्ग के लोग सीएसआर का पैसा लगा कर हर शहर में एक अच्छा सुसज्जित प्रेक्षागृह बना सकते हैं। अन्यथा एक दिन रामप्रकाश थिएटर और गंगा थिएटर की तरह इतिहास के गर्भ में ये प्रेक्षागृह समा जाएंगे। जिस देश में हर वर्ष मंदिरों में सैकड़ों किलो सोना चांदी मंदिरों में चढ़ाया जाता हो, वहां यह कर पाना कोई मुश्किल काम नहीं है बशर्ते संस्कृति के प्रति वैसी ही आस्था हो जैसी धर्म के प्रति दिखाई जाती है। इन पंक्तियों को लिखते समय रंग रथ यात्रा को भारत सरकार के कला एवं संस्कृति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत (जो स्वयं राजस्थान से हैं) हरी झंडी दिखा कर दिल्ली से राजस्थान रवाना कर रहे होंगे। क्या इस यात्रा से राजस्थान के रंगमंच का कुछ भला होगा ?
