‘पहल’ की चेतना एवं ज्ञानरंजन का साहित्यिक संघर्ष

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 ज्ञानरंजन आधुनिक हिंदी साहित्य के उन शीर्षस्थ लेखकों में से हैं, जिन्होंने ‘नई कहानी’ आंदोलन के बाद हिंदी लघु कथा और कहानी के शिल्प और कथ्य को पूरी तरह बदल दिया। उनका लेखन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मध्यवर्गीय समाज की विसंगतियों, पारिवारिक विघटन और आधुनिकता के दबाव में पिसते मनुष्य का एक गहरा मनोवैज्ञानिक और सामाजिक दस्तावेज है।
साठोत्तरी हिंदी कहानी के परिदृश्य पर जब ज्ञानरंजन का आगमन हुआ, तो वह समय सामाजिक और राजनीतिक मोहभंग का था। प्रेमचंद की आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद की परंपरा और नई कहानी के रूमानीपन से अलग, ज्ञानरंजन ने एक ऐसी भाषा और दृष्टि विकसित की जिसने मध्यवर्गीय भारतीय परिवार के भीतर छिपे पाखंड, ऊब और क्रूरता को बेनकाब किया। ‘पहल’ पत्रिका के संपादक के रूप में उन्होंने साहित्य को केवल रचना तक सीमित न रखकर उसे एक सांस्कृतिक और बौद्धिक आंदोलन बना दिया। 1960 के बाद का समय भारतीय समाज के लिए संक्रमण का काल था। आजादी के बाद के सपने टूट रहे थे और एक नया ‘एंग्री यंग मैन’ विमर्श जन्म ले रहा था। ज्ञानरंजन ने इस बेचैनी को अपनी कहानियों में स्वर दिया। उन्होंने व्यक्ति की अस्मिता और सामाजिक संरचना के बीच के द्वंद्व को बारीकी से उकेरा।

ज्ञानरंजन की प्रमुख कृतियों में ‘फेन्स के इधर और उधर’, ‘यात्रा’, ‘क्षणजीवी’ और ‘सपना नहीं’ शामिल हैं। उनकी ‘पिता’ कहानी दिखाती हैं कि कैसे दो पीढ़ियों के बीच केवल उम्र का ही नहीं, बल्कि मूल्यों और संवेदनाओं का एक गहरा अंतराल आ गया है। ‘पिता’ कहानी में पिता का पुरानापन और पुत्रों की आधुनिक सुख-सुविधाओं के प्रति ललक के बीच का तनाव अत्यंत मार्मिक है। इनकी कहानियों में अक्सर एक प्रकार का  ठहराव मिलता है। पात्र अक्सर अपनी स्थितियों से ऊब चुके होते हैं, लेकिन उनमें विद्रोह करने की शक्ति नहीं होती। ‘बहिर्गमन’ और ‘घंटा’ जैसी कहानियाँ इसी मानसिक अवस्था का चित्रण करती हैं। ज्ञानरंजन की भाषा अत्यंत कसी हुई और सघन है। वे कम शब्दों में बड़ी बात कहने की कला जानते हैं। उनके यहाँ बिंब और प्रतीक सीधे यथार्थ से आते हैं, वे थोपे हुए नहीं लगते।

हिंदी साहित्य के इतिहास में पत्रिकाओं की भूमिका केवल रचनाएं छापने तक सीमित नहीं रही है, बल्कि उन्होंने आंदोलनों को जन्म दिया है और विमर्श की दिशा तय की है। इस परंपरा में ‘पहल’ पत्रिका और इसके यशस्वी संपादक ज्ञानरंजन का स्थान ध्रुवतारे के समान है। जबलपुर (मध्य प्रदेश) से निकलने वाली इस पत्रिका ने न केवल समकालीन लेखन को एक मंच दिया, बल्कि साहित्य को उसकी जड़ता से मुक्त कर समाजोन्मुख बनाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। एक संपादक के रूप में ज्ञानरंजन की विशेषता उनकी पारखी नजर और असमझौतावादी दृष्टिकोण रहा है। उन्होंने ‘पहल’ को कभी भी एक साधारण पत्रिका नहीं बनने दिया। उनके लिए संपादन एक बौद्धिक कर्म था, जिसमें वे युवा प्रतिभाओं को तराशने और स्थापित लेखकों को उनकी सीमाओं से रूबरू कराने का काम करते थे। ज्ञानरंजन ने साहित्य में उस ‘अकादमिक अनुशासन’ और ‘कलात्मक गरिमा’ को बनाए रखा, जो अक्सर छोटी पत्रिकाओं में लुप्त हो जाती है।

‘पहल’ का प्रकाशन 1973 के आसपास शुरू हुआ। यह वह दौर था जब देश में राजनीतिक अस्थिरता थी और साहित्य में ‘नई कहानी’ आंदोलन अपनी चमक खो रहा था। ऐसे समय में ‘पहल’ ने प्रतिबद्ध साहित्य की वकालत की। पहल का मूल उद्देश्य साहित्य को जन-सरोकारों से जोड़ना। वैश्विक साहित्य और वैचारिकी से हिंदी पाठकों का परिचय कराना एवं कलावादी और रूपवादी संकीर्णताओं के विरुद्ध एक प्रगतिशील मोर्चा खड़ा करना। ‘पहल’ की सबसे बड़ी ताकत उसकी वैश्विक दृष्टि रही है। ज्ञानरंजन ने महसूस किया कि हिंदी साहित्य को वैश्विक संदर्भों में समझने की जरूरत है। यही कारण है कि ‘पहल’ ने विश्व कविता, विदेशी लेखकों के साक्षात्कार और अनुवादों को प्रमुखता से स्थान दिया। पहल का झुकाव स्पष्ट रूप से प्रगतिशील और वामपंथी रहा है, लेकिन यह कभी भी संकीर्ण या कट्टर नहीं हुई। इसने विचार की स्वतंत्रता और आलोचनात्मक विवेक को हमेशा प्राथमिकता दी। एडुआर्डो गालेआनो, महमूद दरवेश, पाब्लो नेरुदा और नाज़िम हिकमत जैसे विश्वप्रसिद्ध रचनाकारों को हिंदी में लाने का श्रेय काफी हद तक ‘पहल’ को जाता है। ‘पहल’ के विशेषांक (जैसे फिदेल कास्त्रो पर, या विश्व कविता पर) अपने आप में एक संग्रहणीय ग्रंथ की तरह होते थे।ज्ञानरंजन ने ‘पहल’ के माध्यम से लेखकों की पूरी एक पीढ़ी तैयार की। आज हिंदी के जो बड़े नाम हैं—चाहे वे उदय प्रकाश हों, ओम प्रकाश वाल्मीकि हों या समकालीन कवि—उनमें से अधिकांश की शुरुआती पहचान ‘पहल’ के पन्नों से ही बनी। ज्ञानरंजन नए लेखकों की रचनाओं पर कड़ी मेहनत करते थे। वे अक्सर कच्ची रचनाओं को लौटा देते थे या उनमें सुधार के सुझाव देते थे। इसी “संपादकीय कठोरता” के कारण ‘पहल’ में छपना किसी भी लेखक के लिए एक ‘प्रमाण पत्र’ की तरह माना जाने लगा।
अक्सर प्रगतिशील पत्रिकाओं पर यह आरोप लगता है कि वे कलात्मक पक्ष की अनदेखी करती हैं, लेकिन ‘पहल’ ने इस मिथक को तोड़ा। ‘पहल’ का गेटअप, उसका कवर पेज (जो अक्सर सुप्रसिद्ध कलाकारों द्वारा डिजाइन किया जाता था) और मुद्रण की गुणवत्ता उसे अन्य पत्रिकाओं से अलग बनाती थी। ज्ञानरंजन का मानना था कि विचार अगर क्रांतिकारी है, तो उसका प्रस्तुतीकरण भी श्रेष्ठ होना चाहिए।

‘पहल’ केवल प्रशंसा की पत्रिका नहीं थी, बल्कि यह विवादों और बहसों की पत्रिका थी। यहाँ स्थापित मानदंडों को चुनौती दी जाती थी। नामवर सिंह जैसे आलोचकों से लेकर युवा तुर्कों तक, ‘पहल’ के पन्नों पर तीखी वैचारिक मुठभेड़ें हुईं। इसने हिंदी आलोचना को एक नई धार दी और साहित्य में ‘अकादमिक सुस्ती’ को खत्म करने का काम किया। आज के दौर में जब साहित्य बाजारवाद और सोशल मीडिया की सतही चमक का शिकार हो रहा है, ‘पहल’ की याद एक गंभीर बौद्धिक सन्नाटे को भरने वाली लगती है। ज्ञानरंजन ने अपने जीवन के पाँच दशक इस पत्रिका को सींचने में लगा दिए।

‘पहल’ महज एक पत्रिका नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन थी जिसने बताया कि सीमित संसाधनों के बावजूद अगर दृष्टि साफ हो, तो जबलपुर जैसे शहर से बैठकर भी पूरे विश्व के साहित्य से संवाद किया जा सकता है। ज्ञानरंजन और ‘पहल’ का नाम हिंदी साहित्य के इतिहास में अक्षुण्ण रहेगा क्योंकि उन्होंने साहित्य को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रतिरोध का हथियार बनाया।
अक्सर आधुनिकता को केवल पश्चिमीकरण मान लिया जाता है, लेकिन ज्ञानरंजन के यहाँ आधुनिकता का अर्थ है—तार्किकता और आत्म-मंथन। शहरी जीवन में मनुष्य का बढ़ता अकेलापन उनकी कहानियों का केंद्र है। परिवार के भीतर के सूक्ष्म तनाव, भाई-भाई के बीच की ईर्ष्या और पति-पत्नी के बीच की मूक हिंसा को उन्होंने बहुत साहस के साथ लिखा है। आलोचकों का मानना है कि ज्ञानरंजन ने हिंदी कहानी को ‘अति-नाटकीयता’ से बाहर निकाला। नामवर सिंह जैसे आलोचकों ने उनके गद्य की विशिष्टता की सराहना की है। उनकी कहानियाँ पाठकों से बौद्धिक सक्रियता की मांग करती हैं। वे कोई तैयार समाधान नहीं देते, बल्कि प्रश्न छोड़ जाते हैं।

ज्ञानरंजन समकालीन हिंदी गद्य के वे स्तंभ हैं जिन्होंने साहित्य को समाज का दर्पण बनाने के साथ-साथ उसकी कलात्मक गरिमा को भी बनाए रखा। उनके लेखन में जो धार ‘फेन्स के इधर और उधर’ में थी, वही प्रखरता उनके बाद के लेखन और संपादन में भी बनी रही। वे आज भी अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और कलात्मक ईमानदारी के लिए नई पीढ़ी के लेखकों के प्रेरणा स्रोत हैं।

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