विजुअल आर्ट और अभिनय के मेल से जीवंत हुआ ‘हैमलेट’

haimlet

25 वे भारंगम के अंतर्गत राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर के मुख्य प्रेक्षागृह में शेक्सपीयर के बहुचर्चित अंग्रेजी नाटक ‘हैमलेट’ का मंचन राजस्थान विश्वविद्यालय के ड्रामा विभाग के अध्यक्ष शिवप्रसाद तुमु के निर्देशन में हुआ। नाटक में उनके विभाग के छात्रों ने ही अभिनय किया। नाटक का नाट्य रूपांतरण और अभिकल्पन भी शिव का ही था।

नाटक की पृष्ठभूमि नार्वे-डेनमार्क की है और कालखंड 16 वीं शताब्दी का है और डेनमार्क के राजकुमार हैमलेट की त्रासदी इसके केंद्र में है । नाटक का नायक हैमलेट जब विटेनबर्ग पढने गया हुआ होता है तभी उसके पिता रजा हैमलेट की हत्या कर दी जाती है। उसके डेनमार्क लौटने से पहले उसकी माँ ने शादी कर ली थी। पिता की हत्या और माँ द्वारा इतनी जल्दी दूसरी शादी की बात उसे परेशां करती है। एक रात उसे एक प्रेत आत्मा दिखाई देती है जो उसे उसके चाचा क्लाडिअस और माँ द्वारा पिता के विरुद्ध किये गए षड़यंत्र के बारे में बताता है और उससे बदला लेने के लिए प्रेरित करता है। साथ ही यह वादा भी कराता है कि माँ को कोई हानि नहीं पहुंचाएगा। इस द्वन्द से ग्रसित होकर वह काफी मानसिक वेदना से गुजरता है। उसका व्यवहार भी अजीब होने लगता है। लोग समझते हैं कि ऐसा उसके पोलोनिअस की बेटी ओफेलिया से असफल प्रेम की वजह से है। इसको खुद पोलोनिअस भी पुष्ट करता है। ओफेलिया और हैमलेट एक दूसरे से प्रेम करते हैं किन्तु ओफेलिया उसकी विचित्र व्यवहार से परेशां होती है। अंततः हैमलेट क्लाडिअस के षड़यंत्र का पर्दाफाश करता है और क्लादिअस, उसकी माँ मर जाते हैं। ओफेलिया के भाई लेयरटीज और हैमलेट के बीच तलवारबाजी से दोनों बुरी तरह घायल हो कर मर जाते हैं। मरने से पहले हैमलेट अपने मित्र होरेशिय को डेनमार्क की सत्ता संभला देता है। प्रस्तुति में नाटक प्रेत के आगमन से शरू होता है और होरेशिय की गोद में डैम तोड़ते हैमलेट के दृश्य से खत्म होता है। यानी प्रस्तुति में षड़यंत्र कर की गई हत्या और उसके बदले के सूत्र में बांधने का प्रयास है।

शेक्सपीयर के अधिकांश नाटकों के अंत दुखांत ही रहे हैं, औत प्रेत आत्मा का आना, स्वप्न और तलवारबाजी भी कमान फिनोमिना रहा है। यह नाटक पिछले साठ सालों से खेला जा रहा है अतः प्रस्तुति में नवीनता लाना एक चुनौती है ही साथ ही उस कालखंड को प्रस्तुत करना भी चुनौतीपूर्ण काम है। शिवा ने अपने कुशल निर्देशन से संगीत और प्रकाश अभिकल्पन बेहतरीन प्रयोग किया है। शिवा ने मंच पार्श्व में स्क्रीन को तीन हिस्सों में बाँट कर दो अलग अलग विडियो वाल के बीच से एक प्रवेश द्वार दिया गया, और एक रैजड प्लेटफार्म से मंच सज्जा के पूरे काम को अंजाम दिया। यह उनकी कल्पनाशीलता का भी परिचय देता है। क्नालाउन शैली में नाटक वाला दृश्य भी रोचक बन पड़ा है। ईमान और सुंदरता का द्वन्द चित्रित किया गया है। आंतरिक द्वन्द को अभिनय और विजुअल माध्यम के संयुक्त प्रयास से दिखाने की कोशिश प्रस्तुति में की गई।
लोहित व्यास द्वारा मंच पार्श्व में दिखाए गए विजुअल्स से परिवेश की निर्मिती अपने आप में प्रस्तुति में नया आयाम जोड़ती है। विजुअल्स में पत्रों के भावों का प्रकटीकरण बहुत सार्थक प्रयोग रहा। जिस वक़्त ओफेलिया पत्र पढ़ती है , तब पार्श्व स्क्रीन पर फूलों को दिखाया गया जो प्रेम और कोमल संवेदनाओं का प्रतीक है। तलवारबाजी के दृश्य बिम्ब अच्छे बन पड़े हैं , जो काफी अभ्यास के बाद ही संभव हैं।

सभी कलाकारों का अभिनय ठीक ठाक था लेकिन अभी इस क्षेत्र में बहुत काम करने की जरूरत है। क्योंकि यह छात्रो द्वारा अभिनीत नाटक था अतः आगे बहुत सभावना दिखाई पड़ती है। वस्त्र सज्जा की तारीफ करनी होगी। प्रेत के चेहरे को लाल रख कर, क्राउन, सफ़ेद कोट,पेंट और सफ़ेद जूते का प्रयोग के पीछे सम्राट हैमलेट की हत्या और भटकती आत्मा का संकेत देता है। काले कोट और ग्रे रंग के पेंट के साथ कहीं कहीं भूरे रंग का प्रयोग एक अलग दृश्य बिम्ब रचता है। लगभग पौने दो घंटे की प्रस्तुति शुरुआत में थोड़ी शिथिल थी लेकिन बाद में एक अच्छी प्रस्तुति में परिवर्तित होती प्रतीत होती है। भारंगम 26 की जयपुर में प्रस्तुति एक अच्छा प्रयास कहा जा सकता है।

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