
प्रयागराज की उर्वर कला-भूमि पर ‘एक्स्ट्रा एन ऑर्गनाइजेशन’ और ‘कम्युनिटी थिएटर टोंक’ के संयुक्त उपक्रम ने यशपाल की कालजयी कहानी ‘तुमने क्यों कहा था मैं खूबसूरत हूँ?’ के माध्यम से एक वैचारिक क्रांति का सूत्रपात किया है। अख़्तर अली के सधे हुए नाट्य-रूपांतरण और हरमेंद्र सरताज के सुव्यवस्थित निर्देशन ने इस मंचन को महज एक प्रदर्शन न रखकर, मानवीय संवेदनाओं का एक ‘अक्स–रेज़ी’ बना दिया है।
यशपाल की यह रचना मूलतः मध्यमवर्गीय समाज के उस छद्म-शिष्टाचार (Hypocritical Etiquette) पर प्रहार करती है, जहाँ 'सहानुभूति' अक्सर 'अपमान' का आवरण ओढ़कर आती है। नाटक की केंद्रीय संवेदना एक ऐसी स्त्री की विवशता है, जिसका अस्तित्व समाज द्वारा निर्धारित 'सौंदर्य के मानकों' की कसौटी पर बार-बार विफल होता है। जब नायक शिष्टाचार की ओट में उसे 'खूबसूरत' होने का मिथ्या आश्वासन देता है, तो वह स्त्री उस 'मृगतृष्णा' को ही अपना शाश्वत सत्य मान लेती है। नाटक का विस्थापन (Displacement) तब और भी हृदयविदारक हो जाता है जब वह आत्म-बोध के धरातल पर टूटकर बिखरती है।
निर्देशक हरमेंद्र सरताज ने यशपाल के ‘शब्दों’ को मंच पर ‘दृश्यों’ में ढालने में परिपक्वता दिखाई है। नाटक का सेट अपनी स्वाभाविकता और सजीवता के कारण दर्शकों को सम्मोहित करने में सक्षम रहा। ‘स्टूडियो थिएटर’ के आत्मीय परिवेश में सेट की बारीकियाँ इतनी सघन थीं कि दर्शक और अभिनेता के बीच की भौतिक दूरी समाप्त हो गई।
प्रकाश का नियोजन (Lighting Design) पात्रों के अवचेतन मन की उथल-पुथल को उजागर करने वाला था। छाया और प्रकाश का खेल मानवीय मन के उजाले और अंधेरे का सजीव चित्रण कर रहा था। बीच बीच में संगीत नाटक को और भी सम्मोहक बनाया। नाटक में ‘यूनिटी ऑफ टाइम’ , ‘यूनिटी ऑफ प्लॉट’ और ‘यूनिटी ऑफ एक्शन’ का संगम दिखा।
अभिनय के धरातल पर यह प्रस्तुति ‘मेथड एक्टिंग’ और ‘इम्प्रोवाइजेशन’ का अद्भुत कोलाज थी। कलाकारों की ‘कॉमिक और इमोशनल टाइमिंग’ इतनी कसी हुई थी कि एक क्षण का विलंब भी पूरे रसास्वाद को खंडित कर सकता था, परंतु टीम ने इस पर पूर्ण नियंत्रण रखा।मुख्य अभिनेत्री ने अपनी भंगिमाओं, मूक संवेदनाओं और संवादों के उतार-चढ़ाव से उस ‘कुंठा’ और ‘उल्लास’ के द्वंद्व को बखूबी अभिव्यक्त किया।अन्य सह-कलाकारों का मंच-आचरण (Stage Presence) अनुशासित और कहानी के प्रवाह को गति देने वाला रहा। अख़्तर अली के संवादों की दार्शनिक गहराई को कलाकारों ने पूरी शिद्दत से आत्मसात किया।

यह नाटक अंततः समाज से एक कड़वा प्रश्न पूछता है— “क्या हमारी करुणा किसी के लिए जहर बन सकती है?” नायक द्वारा दी गई वह ‘खूबसूरती की सनद’ नायिका के लिए एक ऐसा कारागार बन गई, जहाँ से निकलने का रास्ता सिर्फ आत्म-पीड़ा की ओर जाता है।
कुल मिलाकर, 'तुमने क्यों कहा था मैं खूबसूरत हूँ?' एक ऐसी रंग-यात्रा है जो पर्दा गिरने यानी fed out के बाद शुरू होती है। यह दर्शकों को अपने भीतर झाँकने और अपनी धारणाओं को पुनः परिभाषित करने के लिए विवश करती है। मुट्ठीगंज के इस स्टूडियो थिएटर से निकली यह गूँज प्रयागराज के सांस्कृतिक परिदृश्य में लंबे समय तक सुनाई देगी।

अभिनय करते कलाकार ।
