
भारंगम 26 के अंतर्गत राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर, जियापुर के मुख्य प्रेक्षागृह में प्रसिद्ध नाटककार एवं निर्देशक भानु भारती द्वारा लिखित नाटक ‘नाचनी’ का मंचन मधुर भाटिया के निर्देशन में हुआ |
यह आत्मकथात्मक शैली में एकल नाट्य की प्रस्तुति थी | नाटक एक नृत्यांगना ‘नाचनी’ के जीवन के विभिन्न पड़ावों से गुजरता हुआ भारतीय राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में आए परिवर्तन को रेखांकित करता है साथ ही कला एवं संस्कृति के प्रति समाज के बदलते रवैये को भी बताता है |
भानु भारती ने जब इस नाटक की परिकल्पना की थी, तब इसे सिंधु मिश्रा ने साकार किया क्योंकि उनका तत्कालीन समय में दोनों विधाओं पर अधिकार था | भानु भारती इस नाटक के जरिए कई संदेश देते हैं जिससे नाटक का फलक बहु आयामी हो जाता है | आमतौर पर यह माना जाता रहा है कि राजा रजवाड़ों ने कलाओं को संरक्षण दिया | लेकिन भानु जी का मानना है कि उन्होंने ही स्त्री को गुलाम भी बनाया | इस बात से मैं मुतासिर हूँ कि अधिकांश रजवाड़ों ने कलाओं को संरक्षण दिया | गुणिजन खानों की स्थापना इसका प्रमाण है | लेकिन उससे भानु भारती द्वारा उठाये गये प्रश्न का महत्व काम नहीं होता |
नाचनी के माध्यम से भानु जी यह भी बताने का प्रयास करते हैं कि औपनिवेशिक काल के खत्म होने के बाद भी स्त्री को स्वतंत्रता नहीं मिली बल्कि पुरुष सत्तात्मक समाज ने स्त्री को मनोरंजन का साधन और महज भोग की वस्तु समझा | यह बिडंबना ही है कि इसके साथ उसे अछूत और अपवित्र भी समझा जाता है | उसकी मृत देह को सम्मानजनक अंत्येष्टि भी नसीब नहीं होती | इसके समानांतर भानु भारती सिनेमा के आने के बाद कलाओं पर पड़ने वाले प्रभावों को भी रेखांकित करते हैं |
पारसी थिएटर और नौटंकी में काम करने वाली महिला कलाकारों को समाज में कभी अच्छी दृष्टि से नहीं देखा गया, बल्कि एक तरह से सामाजिक बहिस्कार का शिकार रहीं |
नीली रोशनी के वातावरण में नाटक नाचनी यानी नाटक की नायिका किसुकी बाई अपनी अजन्मी बेटी से एकालाप के जरिए वार्तालाप के साथ शुरू होता है | वह सिलसिलेवार बताती है कि कैसे उसका नृत्य प्रशिक्षण हुआ, मेले में नाचना, मशहूर होना और गर्भवती होने और उस क्षण पुरुष समाज के सामंती व्यवहार से जो प्रताड़ना झेलनी पड़ी | उसका गर्भपात रसिक द्वारा करा दिया जाता है और कैसे वह बीमारी से जूझती है | यानी उसे माँ बनने की स्वतंत्रता नहीं है क्योंकि इससे उसके शारीरिक बदलाव धंधे में बाधक बन सकते हैं | रसिक को उसके दुश्मनों द्वारा मार जाता है | इससे वह मानसिक रूप से टूट जाती है लेकिन दिनों में उसे एक नृत्य कंपनी के मालिक कपूर साहब न केवल उसके सम्मान की रक्षा करते हैं बल्कि अंतिम दिनों तक संरक्षण भी देते हैं |
मधुर भाटिया कहना चाहते हैं कि स्त्री कलाकार आज भी अपने सम्मान और पहचान के लिए संघर्षरत है | स्त्री-पुरुष की बराबरी का दावा सच्चाई से परे है | मधुर नाटक के हवाले से इस हकीक़त से रूबरू कराते हैं समकालीन दौर में भी एक माँ और कलाकार के लिए सम्मानजनक जीवन बिताना आसान नहीं है |
चूंकि नाटक एक नृत्यांगना के जीवन पर आधारित है अतः नायिका के लिए नृत्य और अभिनय में निपुणता अनिवार्य थी | नाटक में नाटककार की नायिका की कल्पना के दृश्य बिम्ब और उसकी मार्मिकता को उभारने का प्रयास किया गया है | अनेक खूबसूरत दृश्य बिम्ब डॉ राखी जोशी अपने नृत्य और अभिनय से प्रस्तुत करती हैं | किसुकी बाई के आत्मकथा कहते हुए कभी शिव तांडव नृत्य के जरिये अपनी शक्ति और मन की भावनाओं को प्रदर्शित करती हैं तो कभी सपेरा बीन की धुन और ढोलक की थाप पर नृत्य की बानगी दिखाते हुए गाती है – चमके चमके म्हारी …., वहीँ दरबार में राजस्थानी लंगा-मांगनियार गायन ‘आवती जावती’ पर राखी नृत्य प्रस्तुत करती हैं | बदलते समय में मेलों में बाइस्कोप के आगमन के साथ नृत्य की प्रतिद्वंदिता को भी दिखाया गया है |
रसिक से किसुकी बाई के रिश्ते को प्रतीकात्मक रूप से गीली लकड़ी के समान बताया गया है वहीँ सफ़ेद चादर, पगड़ी और फूल से रसिक की मृत देह को प्रतीकात्मक रूप से दिखाना कलात्मक दृश्य की निर्मिती करता है | डॉ. राखी जोशी दुबे ने अपने किरदार को निभाते हुए इन दोनों विधाओं में संतुलन बनाते हुए नाटक की मूल भावना को प्रस्तुत किया |
एकल अभिनय में एक साथ कई चरित्रों को अभिनय के जरिये उपस्थित करना एक चुनौतीपूर्ण काम है, लेकिन काफी हद तक राखी जोशी कहरी उतरीं | मनीष जोशी और रवि श्रीवास्तव ने मंच सज्जा में बहुत ज्यादा टीमटाम नहीं किये लेकिन कहानी के अनुरूप प्रॉप्स का इस्तेमाल कुशलता से किया |
मंच के मध्य में ग्रामोफोन रिकॉर्ड प्लेयर, दीवान पर लगी मसनद तथा मंच के दायीं ओर पानी की मटकी, तबला और पुराना लोहे का संदूक कालखंड के साथ-साथ परिवेश को खड़ा करने में सहायक थे | नाट्य युक्तियों के प्रयोग से दृश्य बदलाव हेतु सामने स्टैंड पर टंगी चुनर, घाघरा, पगड़ी और बायीं ओर का वुडेन कर्टेन का प्रयोग निर्देशक की प्रयोगशीलता को दर्शाता है | डॉ. राखी जोशी का दृश्य बदलाव में गति संचालन भी अच्छा रहा | डॉ. राखी जोशी दुबे प्रशिक्षित नृत्यांगना हैं अतः उनके चेहरे पर ममत्व, क्रोध और अस्मिता को बचाने के दृश्यों में अच्छे और मन को छूने वाले भाव प्रदर्शित हुए | मधुर बहुत सी बातों को संकेत में अभिव्यक्त करने में कामयाब रहे | प्रकाश अभिकल्पना में प्रकाश के रंगों और कोणों का ध्यान रखते हुए निराशापूर्ण क्षणों में पार्श्व में लगे परदे का रंग सलेटी रखा और नाचनी के परिधान काले रंग के रखे | नाचनी की झुकी हुई गर्दन की पार्श्व में बनती छवि उस पीड़ा को और गहरा देती है | मेले का दृश्य महज बंधनवार टांग कर बना दिया तो रावले के परिवेश में नाचनी के जीवन में आये बदलाव को प्रतीकात्मक ढंग से सितार तथा नारंगी प्रकाश के इस्तेमाल से व्यक्त किया |
जब जीवन में कुछ सुखद पल थे, उस वक़्त के नृत्य के समय हल्का भूरा, गुलाबी और पीले रंग का इस्तेमाल दृश्य बिम्बों में किया गया | होली गायन की मस्ती के लिए गुलाबी प्रकाश का प्रयोग, प्रसव गिराने का भय और क्रोध में लाल रंग और पहाड़ के दृश्य के साथ दूधिया सफ़ेद प्रकाश का प्रयोग अच्छा लगा |एक-दो स्थानों पर लाइट स्पॉट से अलग चेहरे के भाव जरूर दिखे जो शायद प्रकाश संचालन के अनुरूप पग संचालन न होने से हुआ | राजेश बधु ने दृश्यानुकूल भावों को सपोर्ट करने वाले संगीत का संयोजन किया |
