
कुछ मिलावट होनी चाहिए गलहार होने के लिए
(राँची,02 जनवरी 2026)
यह पंक्ति है गीतकार श्याम नंदन किशोर की जिसमें वह प्रश्न उठाते हैं –शुद्ध सोना क्यों बनाया प्रभु, कुछ मिलावट होनी चाहिए गलहार होने के लिए. अकसर ऐसी पंक्तियाँ मस्तिष्क में घूमतीं रहती हैं. हम लाख सत्य की दुहाई दें लेकिन जीवन क्या सत्य से चल रहा है? संसार क्या सत्य से चल रहा है? मैं यहाँ असत्य की वकालत नहीं कर रहा हूँ. जो महसूस होता है, उसे व्यक्त कर रहा हूँ. सत्य का ताप कौन बर्दाश्त करेगा? जेठ में अलाव जलाकर बैठने वाले को लोग मूर्ख ही कहेंगे. घर में आग लग जायेगी. सत्य बोलेंगे तो अलग-थलग पड़ जायेंगे. पति-पत्नी ,मित्र ,कुटुंब से जो अनमोल सम्बन्ध हैं,सब में दरारें पड़ जायेंगी. सम्बन्ध-विच्छेद हो जायेगा. कबीर यही तो कहते हैं-सच बोले जग मारा जाये, झूठे जग पतियाना. मानव -मन के तहखाने में न जाने कितने सत्य दफन हैं. मजबूरी है. इन्हें दफनाना पड़ेगा. और यह सत्य इसको समझना भी बहुत मुश्किल है. एक का सच दूसरा कभी नहीं जान सकता. जब अपने सच से हम मिलते हैं तो कभी हँसते हैं,कभी रोते हैं,कभी एकल संवाद करने लगते हैं तो कभी पछतावे के आंसू भी निकलते हैं. सच बहुत रुलाता है. मनुष्य से जटिल कोई प्राणी नहीं है. यदि ईश्वर ने इसे बनाया है तो वह भी अपनी इस नायाब कृति पर सोचता होगा. ईश्वर अज्ञेय हों या न हों मनुष्य अज्ञेय है. ईश्वर भी हैरान होगा जैसे हमें कभी-कभी अपनी संतान ही हैरान कर देती है.
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शब्द और उसके प्रयोग
कभी-कभी मैं एक ही शब्द पर बहुत देर तक सोचने लगता हूँ. इतना तो मैं वाक्यों पर भी नहीं सोचता. ऐसा लगता है कि हजारों बार इस शब्द का प्रयोग करने के बावजूद इससे अभी-अभी पहली मुलाक़ात हो रही है. शब्द हमें विस्मय में डाल देते है. वर्षों से एक जैकेट पहन रहा हूँ उसके भीतरी हिस्सों को मैंने कभी ध्यान से नहीं देखा. एक दिन मैंने देखा उसके अंदरूनी हिस्से में चोर-पॉकेट बने हुए हैं. शब्दों की आंतरिक संरचना हमें आश्चर्य में डाल देती है. हम चीजों को ध्यान से नहीं देखते. देखते हैं तो समझने की कोशिश नहीं करते. हम केवल म्यान देखते हैं. हमें यह समझना होगा कि म्यान में तलवार होती है.
एक बात गौर करने लायक है. जैसे-जैसे अपने देश में साक्षरता बढ़ी है, वैसे-वैसे हम भाषा के प्रति लापरवाह हुए हैं. संसद की कार्यवाही हो या समाचार चैनलों पर अहर्निश चलने वाली अनर्गल बहसें सब में भाषा का सत्यानाश दिखाई देता है. सभ्य-शांत और विचारशील व्यक्तियों ने टीवी देखना बंद कर दिया है. संगत के एक एपिसोड में प्रोफ़ेसर रामेश्वर राय ने इस विषय पर गहरी चिंता जताई थी कि क्या साहित्य में गैंग्स ऑफ़ वासेपुर की भाषा का प्रयोग करेंगे? हम साहित्य की दुनिया के बाशिंदें अपने पूर्वजों से भाषा सीखते रहे हैं. हम अपने बच्चों को कौन सी भाषा सिखा रहे हैं. अब तो बच्चे भी ऐसी भाषा में बातें करने लगे हैं कि हम चुप-चकित हो जाते हैं. राजनेताओं की भाषा से दूर हमें एक निश्छल भाषा की ओर लौटना होगा. सब जानते हैं कि राजनीति कोई गंगाजल नहीं है .राजनीति की भाषा उनके लिए ही आरक्षित रहने दीजिए. आखिर में शब्दों के महत्व पर एक जरूरी बात. इन दिनों कन्नड़ लेखक शिवराम कारंथ का उपन्यास मृत्यु के बाद पढ़ रहा हूँ. एक जगह वह लिखते हैं- काल के बीत जाने पर तत्कालीन परिस्थितियों के जानकार मनीषियों की मृत्यु के बाद हमारे लिए केवल जड़ वाक्य बचे रह जाते हैं. एक-एक शब्द आठ-दस अर्थ देता है, ऐसे शब्दों से बने मुहावरेदार वाक्य हैं. इन्हीं के सहारे बुद्ध की वाणी व्यक्त हुई ,वाल्मीकि ने राम को भाषा दी,कृष्ण भी वही कह पायें. यह मनन करने योग्य है कि हम कवि -लेखकों के शब्दों का क्या महत्व है. शब्दों को जो महत्व वाल्मीकि या वेद व्यास ने दिया उसका एकांश भी हम दे पा रहे हैं?
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विनोद कुमार शुक्ल के बहाने
साहित्य में जब किसी को पुरस्कार मिले या उनका देहांत हो जाए तो लोग अपने-अपने विचारों के साथ प्रकट होने लगते हैं. इस बहाने कुछ लोग अपनी कुंठाएं जाहिर कर ही देते हैं. अब जब किसी ने अपना वास्तविक चेहरा दिखाने की ठान ली हो तो कोई उसे नकाब नहीं पहना सकता. अमुक ने ये तो लिखा,वो नहीं लिखा. ऐसे फतवा जारी करने वाले क्या सब कुछ लिख देते हैं. ये लोग गेहूँ के पौधे से गुलाब और गुलाब के पौधे से गेहूँ मांगने वाले लोग हैं. साहित्य कोई मॉल तो नहीं है कि एक ही छत के नीचे हींग से लेकर हरदी और पहनने के लिए जैकेट से लेकर वर्दी तक मिल जाए. बहरहाल,हिंदी के वेब पोर्टलों खासकर हिन्दवी, समालोचन,पहली बार आदि ने शुक्ल जी को शिद्दत से श्रद्धांजलि दी. हिन्दवी ने तो पूरे सप्ताह बेला पर विधिवत यह आयोजन किया और इस बहाने पाखी के विनोद कुमार शुक्ल विशेषांक से गंभीर सामग्रियों के संक्षिप्त अंशों को फिर से प्रकाशित किया. सब के अपने-अपने विनोद कुमार शुक्ल हैं. मुझे इब्बार रबी का विनोद जी के बारे में लिखा यह शीर्षक वाक्य बहुत पसंद आया-वह भाषा के ईश्वर हैं. विनोद जी को पढ़ने वाला सामान्य पाठक भी इसे महसूस कर सकता है कि हिंदी में भाषा का जैसा अनूठा प्रयोग विनोद जी ने किया है,वैसा अब तक कोई नहीं कर सका है. शास्त्रीय संगीत के गायक जो स्वरों के आरोह-अवरोह की साधना करते है,वही सौन्दर्य विनोद जी की भाषा में है. वह धरती और आकाश दोनों की भाषा लिखते हैं. मैंने विनोद जी का एक वीडियो क्लिप देखा जिसमें वे शब्दों के प्रयोग पर बात कर रहे थे. वे कह रहे थे कि मैं ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करता जिसके लिए शब्दकोश देखना पड़े. वह विनोद जी ही हैं जो किसी सरल वाक्य को कविता की पोशाक पहना कर प्रस्तुत कर सकते हैं तो कभी सरल शब्दों से जटिल बिम्ब का सृजन कर सकते हैं. जो हमारे घर नहीं आयेंगे और वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह -इन दोनों वाक्यों को देखें तो विनोद जी की सरलता और उंचाई एक साथ दिखाई देगी.
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(राँची (04 जनवरी 2026)
आज सायंकाल राँची पुस्तक मेला गया. पसंद की कुछ पुस्तकें खरीदी. कुछ पुस्तकें जिन्हें पढ़ना चाहता हूँ,वे नहीं मिली. लोगों की भीड़ कम थी. फिर भी,पुस्तकों के प्रति कुछ लोगों का प्रेम बचा हुआ है.मानव कौल ने एक साक्षात्कार में कहा था कि जब तक एक आदमी भी पढ़ने वाला बचा हो,हमें लिखना चाहिए. सचमुच लेखन अटूट आस्था की मांग करता है. तोड़ने वाली परिस्थितियों के बीच किताबें हमें बचातीं हैं. किताबों में दो विपरीत गुण एक साथ देखने को मिलती हैं. ये ख्वाब देखना सिखातीं हैं तो टूटे हुए ख्वाबों पर मरहम भी लगाती हैं. अब ख्वाब देखने की उम्र तो रही नहीं तो क्यों न अक्षरों की छांव में शेष समय गुजारा जाए. यह सही है कि अब लोग किताबें कम पढ़ने लगे हैं. हमें इस ओर ध्यान देना होगा. यदि हम प्रति माह एक किताब खरीदने का संकल्प लें तो इस दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम होगा. ये सारी बातें बार-बार दुहराई जाती रही हैं. यह समय हिन्दी किताबों को खरीद कर पढने का समय है न कि अंग्रेजी पुस्तकों से शेल्फ सजाने का. रेस्टोरेंट में बैठ कर यदि हजार रूपये का नाश्ता कर सकते हैं तो प्रति माह हम पांच सौ रुपये की किताब क्यों नहीं खरीद सकते.
कल पुस्तक मेले के बहाने कई साहित्यकारों से भेंट-मुलाक़ात का सुखद संयोग बना. मुलाक़ात संक्षिप्त परन्तु दिलचस्प और स्मरणीय रही. आलोचक रविभूषण, कवि प्रकाश देवकुलिश, कथाकार चन्द्रिका ठाकुर देशदीप और अन्वेषी पत्रकार संजय कृष्ण आदि से वर्षों बाद मिला. एक समय था जब माह की आखिरी तारीख में कथाकार वासुदेव के दफ्तर की छत या फिरायालाल चौक पर हमलोग घंटों खड़े रहकर साहित्यिक हलचल पर बातचीत करते थे और पसंद की पत्रिकाएं खरीदते थे.वे क्या सुनहरे दिन थे.
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हमें कृतज्ञ होना सीखना होगा
(05 जनवरी 2026)
मेरी जिन्दगी मेरी मर्जी कहने वालों से कोई विशेष आपत्ति नहीं है. पर उन्हें स्वयं इस पर विचार करना चाहिए. इस जिन्दगी पर अनेक के अनंत उपकार हैं. हम इस पर कभी ध्यान से नहीं सोचते. निर्माण में समूह का योगदान होता है,विध्वंस तो कोई अकेले भी कर सकता है. हमें अपने माँ-पिता,गुरुजन ,पृथ्वी,आकाश ,जल,पेड़-पौधे ,किसान और इस संसार को सुन्दर बनाने वाले वैज्ञानिकों एवं तकनीशियनों के बारे में सोचना चाहिए. हमने कभी रुक कर इन पर विचार किया.? हम उन लेखकों के बारे में सोचते हैं जिनकी किताबें हमारे पाठ्यक्रम में शामिल हैं. हम उन लेखकों के बारे में शायद ही कभी सोचते हों जो स्वान्तः सुखाय ही सही दिन-रात एक कर सृजन करते हैं और अंततः पाठक उन्हें पढ़ कर समृद्ध होते हैं. उनके श्रम पर कभी चिंतन कीजिएगा. उन्हें इस काम के लिए कोई अर्थलाभ प्राप्त नहीं होता. विरले कुछ लेखक हैं जिन्हें रॉयलिटी की मामूली रकम मिलती है. क्या उनका काम सम्मान का अधिकारी नहीं है.? यदि किसी को कोई अपना कवि रूप में अपना परिचय दे तो वह मन ही मन मुस्कराएगा. उसकी दृष्टि में लिखना जैसे कोई फालतू काम हो. यहाँ तक कि घर में भी इस काम को बहुत सम्मान के साथ नहीं देखा जाता. यह कितनी बड़ी विडंबना है कि एक लेखक जो संसार की चिंताओं में डूबा रहता है,उसकी चिंता कोई नहीं करता . भारत में और इसकी राजभाषा हिन्दी में लिखने-पढ़ने वाला आदमी हर समय घुटन में जीता है. अनेक साहित्यकार हुए जो अवसाद के शिकार हुए. उनकी असामयिक मृत्यु हुई. सवाल यह उठता है कि क्या वही काम काम है जिससे पैसे मिलते हैं. बहुत से ऐसे काम हैं जिनसे एक पैसा नहीं मिलता लेकिन उनके बिना जीवन नहीं चल सकता. दुनिया में जो अनिवार्य हैं वे अनमोल हैं. प्रकृति उन्हें मुफ्त में उपलब्ध कराती जैसे-हवा,पानी. मेरे मन में यह प्रश्न बार-बार उठता है और उद्वेलित करता है कि क्या हम केवल फलदार वृक्ष लगायेंगे. वृक्ष फल दे या न दे, छाया और ऑक्सीजन तो देते ही हैं. साहित्य भी हमें वही ऊर्जा देता है. एक कम पढ़ा-लिखा आदमी भी अपनी अभिव्यक्ति के समर्थन में कुछ अतिरिक्त जोड़ना चाहता है. यह अनुभव की बात है. कम से कम वह मानस की एक चौपाई या रहीम के दोहे की अर्धाली भी कहना चाहता है. यदि इतना भी वह नहीं कह सकता तो स्थानीय लोकोक्तियों का सहारा ढूंढता है. हमारी निर्मित्ति में इन असंख्य घटकों का योगदान है और इस नाते हममें उनका थोड़ा-थोड़ा हिस्सा बनता है. ऐसा सोचते हुए हमारे हाथ स्वत: श्रद्धा से जुड़ जायेंगे. हमें कृतज्ञता का पाठ पढ़ना होगा. इसके बिना सारी डिग्रियां अधूरी हैं.
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स्रोत – लेखक द्वारा बहता नीर के लिए चयनित।

जीवन दर्शन पर आधारित यह ललन जी की यह डायरी कितना कुछ सीखा देती है।
जीवन दर्शन पर आधारित यह ललन जी की यह डायरी कितना कुछ सीखा देती है।