
“प्रेम सत्य है, यह जांचने की कसौटी है उसमें निहित स्वातन्त्र्य। यदि प्रेम किसी की स्वतंत्रता को नष्ट करता है तो वह वास्तविक नहीं, वस्तुतः प्रेम का अभिनय है। प्रेम में तो स्वतंत्रता अन्तर्निहित है।”
• ओशो
14 फरवरी यानि ‘वेलेंटाइन’ का दिन था। रात के तीन बज रहे थे । कवि अनुराग अनंत के शब्दों में कहें तो –
“स्वप्न मेरा संस्कार था
मैंने जागते हुए स्वप्न देखे
यह रात का अपमान था
और नींद पर लानत
रात ने शापा मुझे
और नींद ने धिक्कार दिया”
देर तक करवटें बदलते रहने और नींद से धिक्कारे जाने के बाद थक हार के फिर से फोन उठा लिया । इंस्टा पे रील्स स्क्रॉल करने लगा। कब डेढ़ घंटे बीत गए पता ही नहीं चला। पर नींद!… नींद है कि कम्बख़त! आती ही नहीं। बिस्तर से उठा, पानी पिया । और छत पर चला गया। ठंडी हवा चल रही थी। अच्छा लग रहा था। पर हल्की सिहरन के साथ ठंड भी लग रही थी। छत पर रखी एक कुर्सी पर कुछ देर बैठा रहा। आने का मन तो नहीं था पर मच्छर इतने ज्यादा काट रहे थे कि मजबूरन आना पड़ा नीचे बिस्तर में। मोबाइल में टाइम देखा तो घड़ी की सुई ने पौने पांच बजा दिए थे। कई दिनों से रश्मिका मंदाना की हाल ही मे आई फ़िल्म ‘The Girlfreind’ डाउनलोड करके रखी थी। तो वही देखने लगा । मुझे लगता है कि कब क्या होगा नियति ने सब पहले से तय कर रखा है। शायद नियति ने यही समय चुना मुझे यह फ़िल्म दिखाने का ; ठीक वेलेंटाइन के अगली रात । इस समय ही क्यों चुना? ये तो भविष्य के पेट में छिपा है। खैर..
अब जब फिल्म देखकर खत्म की तो इस बारे में कुछ बात भी होनी चाहिए। फ़िल्म का टाइटल और पोस्टर देख के एकबार को लगेगा कि ये कोई टिपिकल रोमांटिक फ़िल्म है। जिसमें पारंपरिक कॉलेज रोमांस दिखाया गया होगा , लेकिन फ़िल्म देखने पर सारे भ्रम टूट जाते हैं।
यह फ़िल्म केवल मनोरंजन ‘ नहीं, बल्कि एक ‘मनोवैज्ञानिक प्रयोग’ (psychological experiment) है, जो कॉलेज रोमांस के लुभावने आवरण में लिपटकर आता है, ताकि हमारे समाज में व्याप्त ‘विषाक्त आत्मीयता’ (toxic intimacy) की परतों को उधेड़ सके।
यह फ़िल्म रश्मिका मंदाना के लिए एक ‘रणनीतिक प्रस्थान’ (strategic departure) है। भूमा के रूप में उन्होंने भेद्यता (Vulnerability) और आंतरिक छटपटाहट को जिस तरह जीवंत किया है, वह उनके करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। विशेष रूप से बाथरूम में घबराहट के दौरे (Panic Attack) वाला दृश्य रश्मिका की अभिनय क्षमता का प्रमाण है।
वर्षों तक ‘नेशनल क्रश’ की आभा में सुरक्षित रहने के बाद, रश्मिका ने यहाँ अपनी उस सहज मुस्कान को त्यागकर एक ऐसी स्त्री की ‘कैफ़ियत’ (condition) को जिया है, जो प्रेम के नाम पर अपनी अस्मिता खो रही है।
यह फ़िल्म उस पारंपरिक सोच पर प्रहार करती है जहाँ पुरुष का आधिपत्य और स्त्री का मौन ‘आदर्श प्रेम’ का पर्याय मान लिया जाता है।
यह समीक्षा केवल एक चलचित्र का विवरण नहीं, बल्कि उस सूक्ष्म घुटन का विश्लेषण है जो धीरे-धीरे एक स्वतंत्र रूह को निगल लेती है। आइए, भूमा की इस यात्रा के उन अंधेरे गलियारों में प्रवेश करें जहाँ प्रेम एक वरदान नहीं, बल्कि एक अभिशप्त बेड़ी बन जाता है।
‘The Girlfriend’ की कथावस्तु कोई तीव्रगामी घटनाक्रम नहीं है, बल्कि यह ‘भावनात्मक क्षरण’ (emotional erosion) का एक धीमा और सचेत चित्रण है। कहानी की नायिका भूमा (रश्मिका मंदाना) अपने छोटे से शहर की सादगी को समेटे हैदराबाद की प्रतिष्ठित ‘नालसार यूनिवर्सिटी’ (NALSAR) में अंग्रेजी साहित्य (M.A. English Literature) की परास्नातक पढ़ाई करने आती है। साहित्य की छात्रा होने के नाते उसकी कल्पनाओं में स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के रंग हैं, लेकिन नियति उसे विक्रम (दीक्षित शेट्टी) के सम्मुख ला खड़ा करती है। विक्रम, जो कंप्यूटर साइंस का छात्र है, तर्क और नियंत्रण की उस दुनिया से आता है जहाँ भावनाओं को भी एक ‘एल्गोरिदम’ में बांधने की कोशिश की जाती है।उनका मिलन एक ‘हादसे’ से शुरू होता—आधी रात की एक जॉयराइड, जहाँ विक्रम एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति (जो बाद में पुलिसकर्मी निकलता है) को महज़ इसलिए पीट देता है क्योंकि उसने भूमा को टोका था। फ़िल्म यहाँ एक गहरा कटाक्ष करती है; जिसे दर्शक और भूमा ‘नायक का संरक्षण’ समझकर उस पर मोहित होते हैं, वह वास्तव में विक्रम की हिंसा और उसके ‘एहसास-ए-बर्तरी’ (superiority complex) का पहला ‘खतरे का संकेत’ (red flag) था। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, विक्रम की ‘देखभाल’ एक मनसूबा-बंद (planned) गैसलाइटिंग में बदल जाती है। वह भूमा के समय, उसके मित्रों और यहाँ तक कि उसके स्वाभिमान पर भी पहरा बैठा देता है विक्रम (विक्की) का चरित्र पितृसत्तात्मक वर्चस्व का आधुनिक चेहरा है। वह भूमा के साथ ‘घरेलू और मनोवैज्ञानिक अंतरंगता’ (Domestic and Psychological Intimacy) का एक ऐसा भ्रमजाल बुनता है, जहाँ वह रक्षक के रूप में हिंसा को भी जायज ठहराता है। उदाहरण के लिए, आधी रात को एक बुजुर्ग पुलिसकर्मी की पिटाई करने को फिल्म शुरुआत में विक्की के ‘वीरत्व’ के रूप में दिखाती है, जो वास्तव में उसकी अनियंत्रित आक्रामकता का प्रमाण है। विक्की एक दृश्य में भूमा से कहता है – “तुम मेरी दुनिया हो।” एक नज़र में ये उसके अनन्य प्रेम का इज़हार लगेगा लेकिन वास्तविकता ये है कि ऐसा कहकर वह भूमा को उसके दोस्तों और सपनों से दूर कर उसे पूरी तरह खुद पर आश्रित बनाता है। वह भूमा को पूरी सामाजिक अलगाव की स्थिति में ला देता है।
निर्देशक राहुल रवींद्रन ने फ़िल्म की गति को जानबूझकर ‘लेज़रली पेस’ (leisurely pace) पर रखा है। यह धीमी गति कोई तकनीकी दोष नहीं, बल्कि दर्शक को उस ‘स्लो-मोशन क्षरण’ का अनुभव कराने का माध्यम है, जिसे भूमा हर पल महसूस करती है। यह निकटता सुरक्षा नहीं देती, बल्कि ‘दर-ओ-दीवार’ (walls/environment) को संकरा कर देती है, जहाँ साँस लेना भी एक चुनौती बन जाता है। इस चलचित्र की सार्थकता इसके पात्रों के उस मनोवैज्ञानिक द्वंद्व में है, जो प्रेम की प्रचलित धारणाओं को खंडित करता है।
रश्मिका ने यहाँ अपने करियर का सबसे परतदार (layered) अभिनय किया है। भूमा एक ऐसी लड़की है जो ‘अच्छी लड़की’ बनने के सामाजिक बोझ तले दबी है। उसकी यात्रा उस ‘एहसास-ए-कमतरी’ (inferiority complex) से शुरू होती है जहाँ वह स्वयं को विक्रम की तुलना में कमतर आंकती है। लेकिन फ़िल्म का सबसे सशक्त मोड़ उसका ‘चूक इट’ (Chuck It) क्षण है। यह केवल एक संवाद नहीं, बल्कि सदियों के दमन के विरुद्ध एक चीख है। रश्मिका ने भूमा के डर, उसकी अनिश्चितता और अंततः उसके स्वाभिमान की पुनर्प्राप्ति को जिस सूक्ष्मता से पर्दे पर उतारा है, वह उन्हें एक परिपक्व अभिनेत्री के रूप में स्थापित करता है।
दीक्षित शेट्टी ने विक्रम के चरित्र में वह ‘पंच करने योग्य दृढ़ता’ (punch-able conviction) पैदा की है जो एक सफल प्रतिनायक की पहचान है। विक्रम कोई पारंपरिक खलनायक नहीं है; वह ‘जेनरेशनल ट्रॉमा’ (generational trauma) का उत्पाद है। उसके भीतर एक ‘अल्फा’ बनने की सनक है जो वास्तव में उसके पिता के उस व्यवहार की प्रतिलिपि है, जहाँ उन्होंने उसकी माँ को ताउम्र बेज़ुबान रखा। विक्रम को भूमा में अपनी माँ की सेवाभावी और मौन छवि चाहिए। वह प्रेम को ‘अधिकार’ और संवाद को ‘आज्ञा’ समझता है।
इन दोनों का मेल एक विरोधाभास है—जहाँ भूमा एक ‘साहित्यिक विस्तार’ चाहती है, वहीं विक्रम उसे ‘लॉजिकल लिमिट’ में बांधना चाहता है। यह एक ऐसी प्रेम कहानी है जहाँ नायक वास्तव में नायिका की स्वतंत्रता का हत्यारा है।
राहुल रवींद्रन जो इस फ़िल्म के डायरेक्टर हैं, ने दृश्य-रूपकों (visual metaphors) का जो संसार रचा है, वह भारतीय सिनेमा में विरल है। ‘सो वॉट?’ (So What?) की परत को कुरेदते हुए ये दृश्य बताते हैं कि यहाँ समस्या केवल एक खराब रिश्ते की नहीं, बल्कि पहचान के विलोपन (erasure of identity) की है। फ़िल्म में कई सारे (दृश्य) ऐसे बन पड़े हैं जो राहुल रवींद्रन के निर्देशन की काबिलियत को बताते हैं। फिल्म का सबसे प्रभावशाली दृश्य वह है जहाँ भूमा, विक्की की माँ (रोहिणी) से मिलती है। विक्की बड़े गर्व से बताता है कि उसके पिता ने कभी उसकी माँ को बोलने की आज़ादी नहीं दी और उनके बीच संवाद का माध्यम ‘बेल्ट’ हुआ करती थी।
यहाँ ‘दर्पण-अनुक्रम ‘ (The Mirror Sequence) के माध्यम से एक डरावनी झलक दिखाई गई है। जब भूमा, विक्रम की माँ (रोहिणी) की पुरानी साड़ी पहनकर दर्पण के सामने खड़ी होती है, तो उसे अपनी सूरत नहीं, बल्कि अपनी सीरत का कत्ल होता दिखाई देता है। रोहिणी का पात्र, जो पूरी फ़िल्म में लगभग मौन है, भूमा के लिए एक ‘चेतावनी’ है। दर्पण में वह साड़ी केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि वह कफ़न है जिसमें उसकी आकांक्षाओं को दफ़न किया जाना है। यह अहसास कि वह भी अपनी सास की तरह एक ‘शब्दहीन अस्तित्व’ बन जाएगी, उसे भीतर तक झकझोर देता है। स्नानगृह और क्लॉस्ट्रोफोबिया (Shower & Panic Attack): जब भूमा को पैनिक अटैक आता है, तो कैमरा तकनीकी रूप से उन दीवारों को सिमटते हुए दिखाता है। यह दृश्य ‘अस्फिक्सिएशन’ (asphyxiation) यानी दम घुटने की उस स्थिति का भौतिक चित्रण है, जो मानसिक गुलामी से पैदा होती है। यहाँ पानी की गिरती बूंदें उसकी शुद्धि नहीं, बल्कि उसके आंसुओं का विस्तार लगती हैं। ‘Hi Nanna’ का प्रभाव: भूमा का ‘Hi Nanna’ फ़िल्म देखना और भावुक होना, आदर्श पितृत्व और सुरक्षा की उस परिभाषा को तलाशना है जो उसे अपने जीवन में नहीं मिल रही। यह क्षण यह स्पष्ट करता है कि वह प्रेम की भूखी तो है, लेकिन उस प्रेम की नहीं जो उसकी आत्मा का गला घोंट दे। क्लाइमेक्स में भूमा का पूरी ताकत से चिल्लाना और अपना गुस्सा जाहिर करना, उसके भीतर दबी ‘फीमेल रेज’ का प्रस्फोट है। यह उन वर्षों के मौन का अंत है जिसे उसके पिता और विक्की ने थोपा था। पूरी फिल्म में भूमा खुद को दुपट्टे से ढके रहती है, जो उसके संकोच और सामाजिक बेड़ियों का प्रतीक है। अंत में उस दुपट्टे को उतारना उसकी मुक्ति और अपनी ‘एजेंसी’ को वापस पाने का संकेत है।
रश्मिका के किरदार का नाम ‘भूमा’ निर्देशक ने ऐसे ही नहीं रखा है बल्कि एक प्रतीक के रूप में इसका इस्तेमाल किया है। भूमा का अर्थ है ‘धरती’। धरती, जिसमें दर्द सहने की असीम क्षमता होती है, लेकिन जो अंततः भूकंप बनकर अपना विरोध भी दर्ज कराती है। वह विक्की के चंगुल से बाहर निकलकर अपनी ‘स्व’ (Self) की पहचान को चुनती है। यहाँ ब्रेकअप एक राहत (Relief) के रूप में आता है। भूमा की यह व्यक्तिगत जीत एक गहरे सामाजिक संदेश को जन्म देती है, जो पीढ़ीगत बेड़ियों को तोड़ने की शक्ति रखती है।
‘The Girlfriend’ पितृसत्तात्मक अनुकूलन (patriarchal indoctrination) पर एक समाजशास्त्रीय टिप्पणी है। फ़िल्म दिखाती है कि स्त्री की एजेंसी (agency) केवल उसके शत्रुओं द्वारा ही नहीं, बल्कि उसके ‘संरक्षकों’ द्वारा भी छीनी जाती है. राव रमेश द्वारा अभिनीत पिता का चरित्र यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह कोई क्रूर व्यक्ति नहीं हैं, लेकिन उनकी ‘सुरक्षात्मकता’ (protectiveness) भी दमनकारी है। जब वह हॉस्टल पहुँचकर विक्रम को भूमा के कमरे में देखते हैं और तुरंत ‘टी.सी.’ (Transfer Certificate) की मांग करते हैं, तो वे भूमा को एक स्वतंत्र वयस्क के रूप में नहीं, बल्कि अपनी संपत्ति के रूप में देखते हैं। यहाँ प्रोफ़ेसर सुधीर (राहुल रवींद्रन) का हस्तक्षेप फ़िल्म की वैचारिक धुरी है। उनका यह कहना कि “वह एक वयस्क है और उसे अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार है (सहमति के साथ)”, आधुनिक न्यायशास्त्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का शंखनाद है।
फ़िल्म यह कड़वा सच उजागर करती है कि कैसे पुरुष—चाहे वह पिता हो या प्रेमी—स्त्री की जैविक क्रियाओं (हार्मोन्स की चर्चा) का हवाला देकर उसके निर्णयों को तर्कहीन सिद्ध करने की कोशिश करते हैं। फ़िल्म का अंत किसी मिलन से नहीं, बल्कि स्वावलंबन की उस साहसी घोषणा से होता है जहाँ नायिका अपनी ‘अच्छी लड़की’ की छवि को तिलांजलि दे देती है।
तकनीकी रूप से, फ़िल्म एक ‘काव्यात्मक लेकिन दमघोंटू’ (poetic yet suffocating) वातावरण बनाने में सफल रही है। हेशम अब्दुल वहाब का संगीत भूमा की अंतरात्मा की आवाज़ है। विशेषकर ‘नीधे कथा’ (Needhe Katha) गीत, जो भूमा के दृष्टिकोण (POV) को स्वर देता है, तब बजता है जब समाज ने उसे मौन रहने का आदेश दिया होता है। यह संगीत ही है जो दर्शकों को उसकी व्यथा का सहभागी बनाता है।कृष्णन वसंत का छायांकन एक दृश्य-उपलब्धि है। शुरुआत में कैमरे के शॉट खुले और चमकदार हैं, जो एक नए शहर की उम्मीदों को दर्शाते हैं। लेकिन जैसे-जैसे विक्रम का नियंत्रण बढ़ता है, फ्रेम तंग होने लगते हैं। विक्रम को अक्सर भूमा के कंधे पर हाथ रखे या उसके पीछे छाया की तरह खड़ा दिखाया गया है—यह आलिंगन नहीं, बल्कि ‘कारावास’ (imprisonment) का रूपक है। चोटा के. प्रसाद का संपादन फ़िल्म की मंथर गति को उस ‘भावनात्मक कटाव’ के साथ जोड़ता है, जिससे दर्शक अंत तक भूमा के लिए प्रार्थना करने लगता है।
‘The Girlfriend’ भारतीय सिनेमा के उस नए युग की आहट है जहाँ प्रेम का अर्थ समर्पण नहीं, बल्कि समानता है। हालाँकि इसकी ‘लेज़रली पेस’ और कुछ हद तक अनुमानित कथानक धैर्य की परीक्षा ले सकते हैं, लेकिन इसकी ईमानदारी और गहराई इसे एक ‘अनिवार्य सिनेमा’ (mandatory watch) बनाती है। यह एक ऐसी ‘नारीवादी मास एंटरटेनर’ है जो पुरुषों को उनके विशेषाधिकारों के प्रति सचेत करती है और महिलाओं को अपनी कीमत पहचानने का साहस देती है।
राहुल रवींद्रन ने एक ऐसा आईना दिखाया है जिसमें हम अपने भीतर के ‘विक्रम’ और अपने आस-पास की ‘भूमा’ को पहचान सकते हैं। यह फ़िल्म भूमा देवी के उस पुनर्जन्म की गाथा है जहाँ वह पृथ्वी की तरह सब कुछ सहना बंद कर देती है और एक स्वतंत्र आकाश की ओर उड़ान भरती है। आलोक धन्वा की कविता ‘भागी हुई लड़कियां’ की कुछ पंक्तियों के हवाले से कहा जा सकता है-
” वह कहीं भी हो सकती है
गिर सकती है
बिखर सकती है
लेकिन वह ख़ुद शामिल होगी सब में
गलतियाँ भी ख़ुद ही करेगी
सब कुछ देखेगी
शुरू से अंत तक
अपना अंत भी देखती हुई जाएगी
किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी “
‘The Girlfriend’ भारतीय सिनेमा में ‘विषाक्त मर्दानगी’ (toxic masculinity) के चित्रण के लिए एक नया मानक स्थापित करती है। हालांकि फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल नहीं रही और कुछ हिस्सों में यह धीमी और दोहराव वाली महसूस होती है, लेकिन इसकी ‘नैरेटिव ईमानदारी’ और तकनीकी रूपक (जैसे सिकुड़ती दीवारें) इसे एक महत्वपूर्ण फिल्म बनाते हैं। राहुल रविंद्रन का निर्देशन और रश्मिका मंदाना का करियर-बेस्ट प्रदर्शन यह साबित करता है कि सच्ची स्वतंत्रता स्वयं को पहचानने और टॉक्सिटी को ‘ना’ कहने में है। यह फिल्म मनोरंजन से अधिक एक सामाजिक विमर्श है।

बेहद ही सुंदर और खूबसूरत समीक्षा ।
बहुत शानदार समीक्षा भईया 🙏