कौन समझेगा बेबसी का दुःख
जैसे सूखी हुई नदी का दुःख
बात करने को सिर्फ मोबाइल
कितना तन्हा है इस सदी का दुःख
घर को अंदर से खा भी सकता है
एक इंसान की कमी का दुःख
इसलिए साथ उसके बैठा हूँ
मैं समझता हूँ तीरगी का दुःख
रोज़ खोती हैं माएँ बच्चों को
अब भी कायम है देवकी का दुःख
जाने कब से मैं अपने काँधे पर
लेके चलता हूँ आदमी का दुःख।
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