कहते फिरेंगे लोग कि कायर था डर गया

कहते फिरेंगे लोग कि कायर था डर गया
इक रोज़ जो मैं ऊब के जीवन से मर गया

जब मिल न पाई नौकरी, बनने लगा मज़ाक़
इतना बना मज़ाक़ कि लड़का बिखर गया

जिस-जिस पे था यक़ीन सभी खेल कर गए
फिर दिल से ऐतबार का नश्शा उतर गया

समझा के अपने आप को लौटा हूँ काम पर
जब चीख़ते पुकारते हफ़्ता गुज़र गया

सोचा था भूल जाऊँगा मैं माँ की मौत को
लेकिन वो हादसा मेरी आँखों में भर गया

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

0

Subtotal