सूरज चलता या घिसता है
हर लम्हा रुकता टिकता है
हर आँख में टूटा ख़्वाब कोई
सब धुँधला-धुँधला दिखता है
स्याही फ़ज़ा पे छिटकी है
ये वक़्त भी कैसा लिखता है
हम चाँद उठाकर लाये थे
अब मेरा सवेरा बिकता है
इक धुन छेड़ी है गवैये ने
सब तना-धिक-ताना-धिक-ता है
