‘कॉस्मोपॉलिटन: दिल और दरारें’ उपन्यास का अंश ‘कोई बीसेक बरस बाद प्रेम’

koi beesek baras

उस रात दो-ढाई बजे फ़ोन बजने लगा था। बजता जा रहा था। बजता जा रहा था। फ़ोन की घंटी पर उसे बेहद गुस्सा आ रहा था। सोते समय भी वह बीवी से गुस्से और चिढ़ से भरा हुआ सोया था। मोबाइल उसका था। उसे पता था कि दीबा उठी हुई हो, तो भी उसका फ़ोन नहीं उठाएगी। बजो। और बजो। उसने नहीं उठाया। पीठ कर ली फ़ोन की तरफ़। स्साला! आदमी अपनी मनमर्जी से कुछ नहीं कर सकता। कहीं भी नहीं। हर समय आदमी को दूसरे के मन की करनी होती है। अब नींद में भी क्या फ़ोन की गुलामी करनी होगी? फ़ोन बज-बज कर चुप हो गया। वह छोटे से संतोष के साथ गहरी नींद में उतर गया।

सुबह हलकी सी रोशनी हुई। बीवी की खटर-पटर की आहटें चालू होते-होते फ़ोन फिर बजा। उसने तपाक से फ़ोन उठाया। फ़ोन पर वह हलो सुनता, उससे पहले ही उसके कलेजे ने बता दिया कि उसके दो टुकड़े होने वाले हैं। उसने पल के हज़ारवें हिस्से में देख लिया था कि रात को बजनेवाला फ़ोन रूमा दीदी का था। अभी भी दीदी ही फ़ोन कर रही थी। उसे न जाने कैसे पता चल गया कि दीदी कहेगी कि माँ नहीं रही। पल के सौवें हिस्से में उसे अचंभा हुआ कि ऐसा कैसे हो सकता है? बीमार नहीं थी माँ; कम से कम इतनी बीमार तो नहीं थी कि एक रात अगर वह माँ के पास रहने न गया तो माँ चल बसेगी। पल के दसवें हिस्से में उसे रात को बीवी से हुआ झगड़ा याद आया जिसके कारण वह माँ के पास सोने नहीं गया था।
“प्रेम जागा है माँ से बीस बरस बाद! कैसी माँ? जिसके मन में बीस बरस में कभी एक पल के लिए ख़याल नहीं आया कि तुम्हारी बीवी को तो छोड़ो, तुम्हारे बच्चों को ही एक बार देख ले!” दीबा के एक-एक शब्द में ज़हर उबल रहा था। वह कटकर रह गया था।

बीस बरस बाद। बीस बरस! कैसे गुज़ारे होंगे माँ ने ये बीस बरस उसके बिना। तब बाईस साल का था वह, पर माँ के हाथ से ही खाना खाता। कोई डाँटे, कोई मज़ाक़ बनाये, पर न माँ को फ़र्क़ पड़ता न उसे। “सुनील को मेरे हाथ से ही खाना भाता है। दो दिन मैं बुख़ार में क्या पड़ी रही, उतने में वजन गिर गया उसका।”
वही माँ बीस साल में उसे इतना भूल गई थी कि उसको पहचान नहीं पाई थी। बदल भी तो कितना गया था वह। उसने मरे मुँह से दीबा को बताया कि माँ के सामने वह खड़ा था और माँ ने उसे बिना पहचाने पूछा, “ओ गो, तुमि के? कौन हो तुम? तुम्हें किससे मिलना है? बड़े बोस बाबू को गुज़रे तो पाँच साल हो गये हैं।” पिता के मरने का समाचार इस तरह मिलेगा, क्या कभी उसने सोचा था? वह पत्थर की तरह खड़ा रहा। फिर बिना कुछ बोले मुड़कर लौट आया था।

वह अभी तक वैसे ही हक्का-बक्का दिख रहा था। दीबा कुछ सोचती सी उसे देखती रही। फिर बोली— “तो क्या हुआ? माँ कैसे पहचानेगी इतने बरस बाद? तब तुम कमसिन थे। अब वज़न दुगुना हो गया सफ़ाचट चिकना चेहरा दाढ़ी से ढक गया।” यह कहकर दीबा ने अपने अठारह साल के बेटे की ओर देखा। उसकी आँखों में हल्का पानी आ गया था। एक माँ के दिल ने शायद दूसरी माँ के दिल की टीस को जान लिया था। बीवी की आँख की झिलमिलाती बूँद ने उसे हिम्मत दी। वह अगले दिन फिर माँ से मिलने चला गया। (- सच बोलो, क्या तुम सिर्फ मां के दिल की सोच कर वापस गए थे?) ख़ैर गया तो था ही अगले दिन। तभी न उसे माँ के पड़ोस में रहनेवाले ममेरे भाई आशुतोष घोष से पता चला कि माँ कल सारी रात सोई नहीं थी। बार-बार फ़ोन करके पूछती थी— “ऐई रे आशु! बता ना। तेरे साथ जो आया था, कौन था वह? किससे मिलने आया था?” बताते हुए आशुतोष उसकी आँखों में ऐसे झाँक रहा था जैसे उसकी आत्मा को खुरच लेगा। “माँ के दिल की टान तो होगी न! … होगी न?”
-आशुतोष ने पहली बार सिद्ध किए हुए सच की तरह और दूसरी बार उससे जैसे हामी भरवाने के लिए सवाल करते हुए कहा। आशु की आँखों के कोर में आँसू थे। उसके अंदर आशुतोष को बचपन की तरह “अरे स्साला! रोंदू कहीं का”- बोलने की इच्छा हुई। बचपन से ही आशुतोष के आँसू हर किसी बात पर टपकने को तैयार रहते थे। कहानियाँ भी ऐसी ही लिखता था, जिनमें भावनाओं के भारी तूफ़ान उठते रहते। रुमा दीदी को उसने कई बार उसकी कहानियाँ पढ़कर आँसू पोंछते देखा था।
आज सचमुच उसके न चाहते हुए भी आँसू का गोला गले में फंस रहा था। “तो तुमने बताया अपनी ‘पिशी’ को, कि कौन मिलने आया था?” — उसने खरखराती हुई भारी आवाज़ में पूछा। आशुतोष का चेहरा चमक उठा। असली ज़िंदगी की कहानी में भावना का तूफ़ान देख वह हुलस रहा था। “क्या तो बोलता? पिशी बिलकुल बहरी हो चली है। मैंने दो बार कहा, ‘सुनील छिलो’, किंतु पिशी दोहराती रही ‘के छिलो गो?’

आशुतोष को धक्का देने की इच्छा को घोंटते हुए वह माँ के पास चला गया था। दीबा से निकाह के बाद एक आशुतोष ही था, जिसने उससे कोई संबंध रखा था। वह भी इतना ही, कि रास्ते-बरास्ते मिल जाए, तो ‘कैमोन आछो’ पूछ ले। न उसके बीवी-बच्चों का, न ही उसी पृथ्वी पर रहते उसके माँ-बाप का भूल से भी ज़िक्र करे। तभी तो पिता के पाँच साल पहले गुज़र जाने का समाचार उसे इस तरह माँ से मिला था। आशुतोष शायद किन्हीं दूसरी बातों से बचने के लिए ख़ाली-पीली उसकी नौकरी के बारे में दस-बीस बातें कर लेता था।

नौकरी भी क्या कोई नौकरी जैसी थी उसकी? एक बड़ी मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में केयरटेकर की नौकरी। यानी एक बॉस नहीं, बारह तल्लों में रहनेवाले चौबीस मालिक। नहीं ग़लत बोल गया; हर तल्ले के दो फ्लैट और हर फ्लैट के ‘सर’ और ‘मैडम’ दो मालिक। यानी कुल मिलाकर अड़तालीस बॉस। सुबह दस बजे से शाम छह बजे तक दड़बेनुमा ऑफिस के कमरे में लैंडलाइन फ़ोन में घंटी पर घंटी बजती रहती। अपना मोबाइल नंबर उसने किसी को दिया ही नहीं था, वरना कोई रात को भी सोने न देता… पानी कम क्यों आ रहा है? पानी का स्वाद ख़राब है, पीकर देखिए। टंकी की सफ़ाई कब हुई थी? मेरी पार्किंग में किसने गाड़ी खड़ी कर दी? बाथरूम साफ़ करने पाँच दिन से जमादार नहीं आया। सिक्योरिटी गार्ड ने मेरी बीवी से बदतमीज़ी से बात की ….. कम से कम सौ ऐसी शिकायतें। मकान के दरबान, बिजली मिस्त्री, प्लम्बर, जमादारों की आपसी लड़ाइयाँ। मालिकों से उनके झमेले अलग! मालिकों की एक दूसरे को थाना-कचहरी की धमकी! वह चकरघिन्नी हुआ जाता।

अब तो मुश्किल से मिली यह नौकरी भी छोड़ने की नौबत आ गई थी। नौकरी जिसकी वजह से मिली, उसी के कारण। यानी दीबा के कारण। दीबा उसी मकान के दो-तीन घरों में योगा ट्रेनर का काम करती थी। एक मैडम से उसने अपने पति मिस्टर सुनील बोस के लिए कहीं नौकरी दिलाने की दरखास्त की थी। पति का नाम-जाति सुन मैडम चौंकी थी, ‘ऐं, इस मुसल्ली का पति हिन्दू है?’ पर वह खुद को उदारमना मानती थी। उसने अपने पति से छुपाकर मिस्टर बोस को ज्यादातर मारवाड़ी और एकाध पंजाबी-सिंधी – गुजराती से भरे मकान में केयरटेकर की नौकरी दिला दी थी, इस हिदायत के साथ की किसी को कुछ पता ना चले। तब आधार कार्ड का ज़माना नहीं आया था। इसलिए बेखटके वह नौकरी पर लग गया था। अब जाने कैसे मकान के जमादार विश्वनाथ को पता चल गया था कि सुबह-सुबह मकान में आनेवाली मुसलमान योगा टीचर का पति वही है। वह सुबह दस बजे काम ख़त्म कर घर लौटती हुई दीबा के पीछे-पीछे मिस्टर बोस-मिस्टर बोस कहता चलने लगता। दोपहर में उसके ऑफिस के कमरे में घुस आता। एहतियातन कालीघाट से माँ काली का फ्रेम ख़रीदकर उसने वहाँ दीवार पर टांग रखा था। (-कोई पूछे तो मां काली के पुराने भगत क्या तुम नहीं थे?-) इन दिनों जमादार विश्वनाथ के वहाँ आकर ज़ोर से ‘जोय माँ काली’ कहने के मक़सद को वह खूब समझ रहा था। दीबा को उसके कारण बदतमीज़ी झेलनी पड़े, वह कैसे होने दे सकता था? (- वैसे यह पूरा सच नहीं था। असली कारण दूसरा था। हमेशा तुम कुछ न कुछ छुपाते रहते हो-)

बहरहाल, वह आशुतोष को परे करता माँ के पास गया, तो माँ ने दरवाज़ा खोल उसे देखते ही उसका हाथ पकड़कर अपने पास खींच लिया था, “माँ की याद आ गई तुझे?” वह पलंग पर माँ को बैठाकर खुद नीचे बैठ उसके पैरों में सिर दिये रोता रहा था। माँ भी रो रही थी। जाने क्या-क्या बोलती जा रही थी। कुछ उसके बचपन की, कुछ पिता की, कुछ और बातें, जो उसकी समझ से परे थीं। उसे इतना समझ आया कि बड़ा भाई अरूप पागलों जैसी हरकतें करता है। वह कहीं दूर रहता है। उसकी बीवी उससे तंग आकर वहां से 222 नंबर बस में अकेले बैठ कर यहाँ पहुँचवा देती है। उसके बाद वह माँ का जीना हराम किए रहता है। पिछले सप्ताह पूरा-पूरा नंगा होकर गली में निकल गया था। तब लोग उसे मारते हुए वापस ले आये। आशुतोष के साथ टैक्सी करके उसे भगाया। शर्मिंदगी के कारण तबसे माँ घर से बाहर नहीं निकली।

उसे समझ में नहीं आया कि माँ उसके इतने साल बाद लौटने पर रो रही है या अरूप दा की हाल की बेहयाई पर या पाँच साल पहले पिता के न रहने पर। वह अपने आँसू पोंछकर उठकर माँ की बग़ल में बैठ गया और माँ की बातें सुनता रहा। माँ उसे ठीक बचपन की तरह इस तरह किस्से पर किस्से सुनाती जा रही थी जैसे बीच के बरसों का कोई व्यवधान हुआ ही न हो। माँ ने उससे कुछ नहीं पूछा कि वह कहाँ रहता है? उसकी छत पक्की है या टिन-टप्पर से बनी है? कि उसके कितने बच्चे हैं? कितने बड़े हैं? कि उसकी बीवी कैसी है? वह कहाँ नौकरी करता है? कुछ नहीं। बस माँ पिछले बीस सालों की हिस्ट्री उसे आगे-पीछे से सुनाती रही। वह माँ का मुँह देखते उसके ढीले पड़ गये चेहरे की झुर्रियों को देखता रहा। माँ कितनी सुंदर रही थी, यह अब भी कोई देख सकता था। माँ ने यह तक नहीं पूछा कि वह इतने साल क्यों नहीं आया था और अब क्या करने आया था। (- सोच कर आया था की मां पूछेगी, तो सच कह देगा। नए झूठ नहीं ग़ढ़ेगा।) मां ने उसे मौका ही नहीं दिया कि वह कुछ कहता।

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अपनी माँ के मरने की कहानी सुनाता सुनील बोस अब भी रो रहा था। बीच-बीच में वह अपने से बात करता कुछ बड़बड़ाता जैसे अपनी ही बोली हुई बात पर ख़ुद से ही सवाल कर रहा हो। उसका चिकना सुंदर चेहरा दाढ़ी-मूँछ की भीड़ से झाँक रहा था। उसका क़द थोड़ा अच्छा होता, तो वह किसी फ़िल्म में हीरो बन सकता था। बिलकुल ‘टिपिकल’ भद्र बंगाली चेहरा, जिसे माँ-बाप ने जन्म के साथ ही इतने लाड़-प्यार से लादा हो, कि उसकी मासूमियत बयालीस साल की उम्र में भी कायम रहे। उसकी आँखों में ऐसी हैरानी बसी थी, जैसे दुनिया की कोई बात उसे समझ न आती हो। किसी को प्यार कर बैठना ऐसा गुनाह कैसे हो गया कि लाड-प्यार तो दूर, उसकी जानी-पहचानी दुनिया उठकर जैसे किसी दूसरे ग्रह पर बस जाए और उसे पूरी तरह भूल जाए।

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रूमा दीदी का फ़ोन उठाते-उठाते उसे जो आशंका हुई थी, वह सच निकली। रूमा दी इतनी बुरी तरह रो रही थी कि उसकी कोई बात समझ में नहीं आ रही थी। माँ मर गई, यह तो जानना बाक़ी नहीं रहा था, पर कैसे मर गई, यह राज़ उस रोने में कहीं छुपा था। (- तब समझ में आया कि मरना रहस्य नहीं है। जो आया सो जाएगा ही। कब कौन कहां कैसे मरेगा,यही दुनिया का सबसे बड़ा रहस्य है-) तभी जीजा ने रूमा दी के हाथ से फ़ोन लेकर अपनी भारी-भरकम आवाज़ में साफ़-साफ़ कहा— “निजे के पूड़िये नियेछे।”
“पूड़िये नियेछे?” – बोस ने दोहराया। “पूड़िये नियेछे? मतलब?” — दीबा ने फुसफुसाकर पूछा। वह बंगालिन नहीं थी। उसके घर वाले हिंदी बोलते थे। बंगाल में पैदा होने और बंगाली पति के बावजूद वह बांग्ला भाषा पूरी नहीं समझती थी। बोस ने चिढ़कर उसे धक्का देकर अपने से दूर करते हुए चिल्लाकर कहा- “जला लिया अपने को।” कहते हुए उसने अपना फ़ोन दूर फेंक दिया जैसे जीजा की आवाज़ को फेंक रहा हो। इतने बड़े दुख के आघात के बावजूद उसकी जीजा के प्रति नफ़रत उतनी ही जागी हुई थी।
“माँ माँ”— करता हुआ वह बेतहाशा रोने लगा। रोते-रोते वह बिस्तर से नीचे फिसल कर गिर गया और धरती में अपना मुंह छुपा कर हाहाकार करता रहा। आस-पास की बस्ती के लोग नींद से उठकर दरवाज़े पर आने लगे। मकानमालिक सज्जाद भाई की पत्नी रुखसाना अंदर आकर उसके फ़ोन का ढक्कन और बाहर निकलकर गिर पड़ी बैटरी लगाने लगी। फिर वह नीचे बैठकर “इन्ना लिल्लाही वा इन्ना इलैही रजि’उन” बोलने लगी— ‘वास्तव में, हम अल्लाह के हैं, और वास्तव में, हम उसी की ओर लौटते हैं।’ बोस के अंदर उन शब्दों को सुन जैसे होश आया। उसका रोना ऐसे रुक गया जैसे उसके गले में किसी ने फंदा कस दिया हो। दीबा उसके हाथ में फ़ोन थमाते हुए बोली, “जाओ। जल्दी जाओ” और फूट-फूट कर रोने लगी।

बोस बुरी तरह काँप रहा था। कहाँ जाये? बीस साल बाद लौटा था और अब फिर वह रास्ता खो गया था। “सो गया ये जहाँ, सो गया आसमाँ /सो गईं हैं सारी मंज़िलें, सो गया है रस्ता।” घोर दुख में भी उसके अंदर फ़िल्मी गाने के बोल उभरे। उसके उन्नीस साल के बेटे ने कस कर उसका हाथ थाम रखा था। उन्होंने पीली टैक्सी पकड़ी। दीबा ने जेब में रुपए डाल दिए थे। कोलकाता में इतने मुंह-अंधेरे कोई बस मिलना मुमकिन न था। बोस माँ के घर के सामने उतरा, तो उसके नथुनों में मांस जलने की गंध भर गई। शायद वह कोई बहुत बुरा सपना देख रहा था जिसका सबसे भयानक हिस्सा अब दिखने वाला है। पुलिस की गाड़ी पर नज़र पड़ते ही उसका कलेजा धक से रह गया। पुलिस? ओह! अन-नेचुरल डेथ हुई है! पुलिस कैसे नहीं आएगी? बिल्डिंग में एक फ्लैट मालिक ने दूसरे पर एफआईआर दर्ज की थी। इस सिलसिले में अक्सर पुलिस चक्कर लगाती। कई बार थाने भी जाना पड़ता। पुलिस को देखते ही उसका ब्लडप्रेशर चढ़ने लगता। (- सच तो यह है कि पुलिस का सामना करने से बचने के लिए ही तुम नौकरी छोड़ना चाहते थे-)

मकानमालिक, रुमा दी, जीजा और आशुतोष सब पत्थर की तरह ख़ामोश खड़े थे। उसे देखकर भी कोई कुछ न बोला। वह जैसे नींद में चलता हुआ उसके पास से गुजरता आगे बढ़ा। पुलिसवाले ने रूमा दी से पूछा -“आपका भाई है?” रूमा दी ने सिर हिलाया। दोनों भाई बहन का चेहरा इतना मिलता था कि कोई भी पहचान लेता उसे किसी ने रोक नहीं। वह वैसे ही चलता हुआ माँ के मंदिर वाले कमरे की तरफ़ गया। माँ की काली पड़ी हुई निर्वस्त्र लाश ज़मीन पर गर्भ के शिशु की तरह घुटने पेट में सटाये पड़ी थी। उससे अब भी धुआँ उठ रहा था। उस पर एक पतली चादर ओढ़ा दी गई थी। बग़ल में एक माचिस की जली हुई तीली और डिबिया थी। दो पुलिस वाले कमरे के अंदर थे एक बड़ा अफसर दिख रहा था। ‘ऐसे लेटे-लेटे पूरी जलकर काली ख़ाक हो गई माँ? कौन कहेगा कि अंग्रेज मेम की तरह गोरी हुआ करती थी माँ!’ – बॉस के सुन्न पड़े दिमाग में यह बात आई और ऐसे वक्त पर ऐसी बात सोचने के लिए उसे बदहवास कर गई। तभी जीजा अंदर आकर अफ़सर के पास चला गया। दोनों धीमे बोल रहे थे, और बोस बिलकुल साफ़ सुन रहा था।

“चालीस साल की नौकरी में जलकर सुसाइड करने के बहुत कैसे देखें। पर ऐसा कभी देखने में नहीं आया। रेलवे नहीं कोई किरासन तेल-वेल नहीं, सिर्फ एक माचिस से साड़ी में आग लगा ली? अपनी सोने की चेन, कान के बूंदें, सोने की चूड़ी सब पहले से उतार कर मंदिर में ठाकुर के आगे रख दी। आग लगाकर ना इधर-उधर भागी, न चिल्लाई। इसी तरह लेटी रही।चुपचाप। अपने को इस तरह जलना! जैसे अपनी चिता खुद ही जला ली” – अफ़सर कह रहा था
“इनके पास कोई नहीं रहता था। अकेली रहती रहती थी। अकेले रहते रहते जीवन से थक गई थी। बड़ा बेटा पागल है। छोटा बीस बरस से मिलने नहीं आया। अभी देखिए मौत की खबर सुनकर आया है।” — जीजा ने हिक़ारत से उसे घूरते हुए कहा।

बोस चिल्लानेवाला ही था— “झूठे मक्कार! फिर क्या तू पॉलिटिक्स खेल रहा है? मैं पिछले एक साल से लगभग रोज़ माँ के पास आकर सोया करता था। कल ही नहीं आ पाया था।” तभी रूमा दी अपने पति पर चिल्लाई -“चुप करो। मुँह बंद रखो। माँ हमारी थी। ख़बरदार जो मेरे भाइयों के लिए कुछ कहा!” रूमा दी कब अंदर आई थी, उसने नहीं देखा था। वह अपने पति से अच्छा खासा डरती थी। पहली बार दोस्त उसे इस तरह पति को झोड़कते हुए देखा था। पुलिस वाले ने मामला शांत करने के लिए कहा – “जलकर खाक हुए का पोस्टमार्टम क्या खाक होगा! पर कार्रवाई तो करनी होगी। तभी आप लाश ले सकेंगे।
क्या संस्कार बेटा करेगा? – उसने बॉस को गौर से देखते हुए पूछा।

मां के कपड़े- बाल सब जल चुके थे। वे आंखें भी,जो कल तक उसे देख बचपन की तरह हंस उठती थी। बोस के शरीर का रोयाँ-रोयाँ माँ को देख रो रहा था। पर उसकी आंखों में जैसे रेगिस्तान उतर आया था। उसके अंदर पृथ्वी को उल्टे चक्कर लगवाती रील चलने लगी। बीस बरस बाद माँ के पास लौटा और उसके साथ एक साल रहा। हर रात ऑफिस से दीबा के पास घर जाता। फिर खा-पीकर माँ के पास आकर सोता। वह रील उलट-उलट कर ढूँढता रहा कि माँ ने कब ऐसा संकेत दिया था कि वह जीवन से इतनी तंग आ चुकी है कि इस तरह खुद को खत्म करने वाली है। (- मां! बताओ मां! यदि कल रात तुम्हारे पास आ जाता, तो तुम बच जाती न?-) यह सोच आते ही उसके कलेजे में ऐसी आग जल उठी, की धुएं से उसका दाम घुटने लगा। उसने अपने शर्त पर हाथ लगाकर एक बटन खोल की ठीक से सांस ले सके। तभी उसके बेटे ने उसका हाथ थाम लिया और उसे खींचकर कुर्सी पर बैठा दिया।

रील आगे चलने लगी। चलती रही। आगे। पीछे। जो शब्द बोले गए। जो सुने गए।जीजा ने कहा था, “तुममें दीबा से शादी करने की हिम्मत नहीं है। तुम नहीं कर पाओगे। ‘चिरोदिनी तुमी आमार’- चिर दिन से तुम मेरी हो’ – यह गाना गाते फिरना आसान है, असल में उसे अपना बना नहीं पाओगे।” क्या जीजा की चुनौती के कारण ही उसने शादी की? क्या वह दीबा को तब और अब भी माँ से ज़्यादा प्रेम करता था? क्या जीजा जानता था कि दीबा से शादी करने से उसे बेदखल कर दिया जाएगा? क्या जीजा ससुराल की सारी संपत्ति हड़पना चाहता था, जो आख़िर अब उसे ही मिलेगी? उसने पिता के मरने के बाद उनका छोटा-सा घर बिकवा दिया और रुपये बैंक में माँ के अकाउंट में रख दिये। वे रुपये उसे कभी नहीं मिल सकते क्योंकि उसका नाम अब मिस्टर सुनील बोस नहीं है। उसके आधार कार्ड पर यह नाम नहीं है। उसके पास कोई सबूत भी नहीं है कि वह कभी सुनील बोस था। पार्लियामेंट में ‘सीएए’ – सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट-पास होते ही वह आशुतोष के जरिये माँ को खोजकर उसके पास पहुँचा था कि अपने जन्म का प्रमाणपत्र और स्कूल के सर्टिफिकेट लेकर रख ले। पर माँ के पास कुछ नहीं मिला था। मकान बेचकर घर बदलते समय कूड़ेदान में फेंका गया था या उसकी हस्ती मिटाने उसके निकाह के ठीक बाद? जो खोजने निकला था, वह न मिला। बस माँ मिल गई थी और उसका अकूत अकेलापन।

पुलिसवाला सभी को बाहर निकलने कह रहा था। एम्बुलेंस की आवाज़ नज़दीक आकर चुप हो गई थी। कमरे में माँ को अकेला छोड़ निकलते हुए कुर्सी से उठते हुए वह लड़खड़ा गया। उसके बेटे ने उसे लपककर थाम लिया। तभी जीजा ने लड़के को परे कर, उसकी काँख में हाथ डालकर उसे सहारादिया। वह तिलमिला गया, जैसे किसी साँप ने उसे जकड़ लिया हो। जीजा उसके कान में इतने धीरे से फुसफुसाया कि उसे भ्रम हुआ कि जीजा ने कुछ कहा भी या उसने बिना कहे सुन लिया, “मोहम्मद दानियाल वल्द मोहम्मद याकूब हो न तुम? अगर पुलिस को पता चल जाए कि तुम रोज़ रात यहीं रहते थे, सिर्फ़ कल रात यहाँ नहीं आये थे, तो तुम्हारी उम्रकैद पक्की है। कोई माँगे तुमसे मोहम्मद दानियाल, तो हज़ार रुपये में बना अपना आधार कार्ड मत देना। न मुर्दाघर में न श्मशान में।”
उसके पाँव धरती में जम गये। चारों ओर साँप कहाँ से आ गए थे? पाँव बढ़ाता, तो किसी-न-किसी साँप के ऊपर पड़ता। जीजा को कैसे पता कि ठीक हज़ार रुपये खर्च कर उसने पिता का यही नाम रखकर फ़र्जी आधार कार्ड बनवाया था? इसके लिए उसे सिर्फ़ अपने अँगूठे की छाप देनी पड़ी थी। उसके अंदर फिर धुआँ भरने लगा। वह होश खोकर जीजा के ऊपर झूल गया। पर बेहोश होने के पहले पल के हज़ारवें हिस्से में उसे पता चल गया था कि वह कोई सबूत नहीं दे पायेगा कि माँ को उसने आग नहीं लगायी है। उसी तरह, जैसे उसके पास कोई प्रमाण नहीं है कि वही मोहम्मद दानियाल है और वही सुनील बोस भी।

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बोस की कहानी में कई पेच थे। इतना बोका या भोला तो वह नहीं दिखता था कि जाकर कलकत्ता म्यूनिसपैलटी से अपने जन्म के नाम से कानूनन अपना बर्थ सर्टिफिकेट न निकलवा पाए। सरकारी कामों में चप्पल घिसने और थोड़ी बहुत घूस देने से काम तो होता ही है, चाहे धरती सूरज की दो-चार ज़्यादा परिक्रमा कर ले। उसके बाद वह अख़बारों में और कोर्ट में एफिडेविट दे सकता था कि ‘मैं, सुनील बोस आज से मोहम्मद दानियाल के नाम से जाना जाऊँगा।’ लेकिन उसे यह सब कहने-सुनने से कोई फ़ायदा न हुआ। वह और ज़्यादा रोने लगा। माँ के इस तरह जल मरने का घाव हरा हो गया था, या कि कोई और बात थी, समझ न आया। वह ‘उम्रकैद? उम्रकैद से बचाएगा! माँ को आग लगाकर क्या मिलता? माँ के गले की चेन, कान के सोने के बूंदे और हाथ की चूड़ी तो माँ ने आग लगाने के पहले खोलकर वहीं रख दी थी। बाक़ी तो बैंक में था।’ बड़बड़ाता हुआ फिर अपने से बात करने लगा था।

लगता है कि उसे यह शक खा रहा था कि जीजा ने ही आधार कार्ड बनानेवाले को भेजा होगा। वरना उसे कैसे पता कि उसने पिता का क्या नाम रखा था और आधार कार्ड बनाने वाले को कितने पैसे दिए गए थे? बेशक इस सृष्टि का हर बंदा किसी न किसी धोखेबाजी या षड्यंत्र के शक से जूझता रहता है। भाई भाई पर शक करता है, माँ-बाप बच्चों पर शक करते हैं। और तो और, देशों को शक रहता है कि दूसरे देश उनके यहाँ आतंकवादी भेजते हैं। मुख्यमंत्रियों को शक होता ही है, दूसरी पार्टी की उनकी सरकार गिराने की मंशा पर। क्या यह नहीं हो सकता है कि जीजा ने अपनी समझ में सब कुछ उसकी मदद के लिए किया हो। दीबा के लिए सच्चा प्यार देखकर उसे शादी के लिए उकसाया हो या असल में चाह रहा हो कि वह दीबा से शादी कर अपने परिवार को धक्का न पहुँचाए। क्या पता कि उसे आधार कार्ड छुपाने की सलाह देकर पुलिस के फंदे में पड़ जाने से सचमुच बचा रहा हो? क्या एक अदद विलेन के बिना किसी के जीवन की कोई कहानी पूरी नहीं होती?

श्रोत- लेखिका द्वारा अपने उपन्यास ‘कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन: दिल और दरारें’ से ‘बहता नीर’ के लिए विशेष रूप से चयनित।

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