खेतों को उदास छोड़कर

बसंत का मौसम
सिर्फ फूलों के खिलने का समय नही होता
यह समय खेतों के खिलने का भी होता है
बात उन दिनों की है
जब हम भी खिल जाया करते थे


स्याह हरा ऱंग खेतों में पसर जाता
यह रंग मानसून के भीगेपन से अलग होता
यहां एक भीनी-भीनी मादकता से परिपूर्ण खुशबू होती
जो आती घास और फसलों से
इसकी मादकता से हम मदहोश हुए जाते
सो जाते वहीं मेड़ों और पगडंडियों पर
धनिया के खेत से आती मादकता से मादक
किसी चीज को मैंने पाया‌ है?
लगता तो नही


स्कूल से लौटकर घर आते
दौड़ पड़ते खेतों की ओर
मेड़ पर भागते
लोट‌ जाते
मखमल‌ से भी ज्यादा मुलायम गेहूं के बिस्तर पर
हम तोड़ने लगते उन छिम्मियों को
जो अनायास ही गेहूं के खेतों में
उग आतीं
नहीं होता उनका कोई मालिक
उनसे भर लेते
अपनी सभी जेबें और दोनों मुट्ठियां
ये बीएसएनएल चौका
कर लो दुनिया मुट्ठी में


पगडंडी से होकर पहुंचते
खेतों के उस पार
गुजरते हुए लगाते
सरसों के फूल
अपने गालों पर
लगाकर उसकी पीली छाप
शर्माते किसी विहौता पुरूष की भांति


निकल जाते
खेतों के बीच बहती नहर के पास
जहां छिम्मियों को खाते हुए निहारते
डूबते सूरज को


वापस लौटती घसियारिनियों के साथ
लौट आते अपने घर
खेतों को उदास छोड़कर।


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