ख्वाबों की सल्तनत

कैसा होता जो वक्त की सुई
किसी पुरानी दीवार घड़ी से फिसल कर
पीछे की ओर दौड़ने लगती
और हम उस मोड़ पर रुक जाते
जहाँ मिट्टी की खुशबू
किसी महंगे इत्र से ज्यादा कीमती थी।

​कैसा होता जो सरहदों पर उगी
कँटीली तारें रातों-रात
मखमली बेलों में बदल जातीं
जहाँ सिपाही बंदूकों की नली में
गोलियों की जगह गुलाब के पौधे सींचते
और युद्ध का इतिहास सिर्फ कहानियों में रह जाता।

​कैसा होता जो यह शहर
कंक्रीट के जंगल नहीं
बल्कि परिंदों की सभा होते
जहाँ इमारतों की ऊँचाई से ज्यादा
इंसानी रिश्तों की गहराई मापी जाती
और नफरत की आग बुझाने के लिए
सिर्फ एक सच्ची मुस्कुराहट काफी होती।

​कैसा होता जो मैं फिर से
तुम्हारी गली का वह बेचैन आवारा होता
और तुम खिड़की पर टंगी
किसी अधूरी कविता की तरह लगतीं
मैं तुम्हें बस नजरों से छूता
और तुम्हारी खामोशी
मेरे सारे सवालों का जवाब होती।

​कैसा होता जो बचपन की
वो कागज की नावें
डूबने के बजाए समंदर पार ले जातीं
जहाँ नफरत के टापू नहीं
सिर्फ जुगनुओं के घर होते
और रातों को डरावने सपनों की जगह
नींद में परियों के पर गिरते मिलते।

​कैसा होता…
अगर मैं फिर से तुम्हारे माथे की
उस अधूरी बिंदी सा होता
जो सजने की जल्दी में—
तुम्हारे कांपते हाथों को छू गई थी।
​मैं तुम्हारे बालों की उलझन सुलझाता,
और तुम मेरी किस्मत की गांठें खोल देतीं।

​कैसा होता जो भगवान
किसी बंद कमरे या मयखाने में नहीं
फटी हुई जेबों और खाली थालियों में मिलता
जहाँ प्रार्थनाएँ लफ्जों में नहीं
आँखों की नमी में सुनाई देतीं
और हर गिरते हुए आंसू को थामने के लिए
खुद आसमान के हाथ नीचे उतर आते।

​कैसा होता जो कायनात का निजाम
अदालतों से नहीं
मासूमों के ख्वाबों से चलता
जहाँ भगवान खुद जमीन पर उतरकर
फटे हुए आँचलों में सितारे टाँक देता
और हर प्रार्थना
लबों से निकलने से पहले ही
अर्श पर कुबूल हो जाती।


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