पति के श्राद्ध में स्त्री
अचानक हँसने लगी
भाई भासुर बेटा सबने सुना
मन्त्र पढ़ता पंडित पढ़ता रहा मन्त्र
भोजन ताकते ब्राह्मण मलते रहे तोंद
फ़ोन देखने वाले देखते रहे फ़ोन
किसी ने कहा वो याद कर रही होगी बीते दिनों को
उसने स्वामी खोया है जो मर्ज़ी करने दो
किसी ने कहा पगला गई है शायद
किसी ने कहा यह भी रोने का ही ढंग है
अगर ख़ुशी में रो सकते हैं
क्या दुख में हँस नहीं सकते
सुनकर ऐसी बातें उसकी हँसी दोगुनी हो गई
होम हवन की अग्नि में चमक रही थी
दूर्वा अक्षत चन्दन से ढकी पति की तस्वीर
धुएँ में घी कपूर की गंध थी
वहाँ स्त्री की हँसी में जीवित हो रहा था उसका पति।
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