अँकवार

अँकवार लिए
उस पेड़ को
वह लतर

शायद गुनगुना रही है
कोई प्रणय गीत

नृत्य-मुद्रा में
थिरकते पाँव उसके
थपथपाते धरती

शाख दर शाख
फैलती चली जाती बाहें उसकी
नाप लेना चाहती हैं आसमान… !!


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Sanjeev
Sanjeev

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