मेरी पथराई आँखों में
घर लौटने की व्याकुलता नहीं है
मेरी उनींदी रातो में
अब आते कोई सपने नहीं हैं
मेरे जीवन की माला में
अब जीने की चमक नहीं है
मैं उपेक्षित हूँ खुद से ही
अब भाते कोई अपने नहीं हैं।
संबंधित विषय – बेरोजगारी
मेरी पथराई आँखों में
घर लौटने की व्याकुलता नहीं है
मेरी उनींदी रातो में
अब आते कोई सपने नहीं हैं
मेरे जीवन की माला में
अब जीने की चमक नहीं है
मैं उपेक्षित हूँ खुद से ही
अब भाते कोई अपने नहीं हैं।