चर्यापद आदिकाल के सिद्ध साहित्य की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विधा है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘आचरण के पद’ होता है। ये पद मुख्य रूप से चौरासी सिद्धों द्वारा 8वीं से 12वीं शताब्दी के बीच रचे गए थे। चर्यापद सिद्धों की तंत्र-साधना और उनके धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान गाए जाने वाले गीत थे। इन पदों की खोज महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने 1907 ईस्वी में नेपाल से की थी और इन्हें ‘बौद्धगान ओ दोहा’ नाम से प्रकाशित कराया गया था। शबरपा, कण्हपा और लुइपा जैसे प्रमुख सिद्धों ने इन पदों की रचना की है, जिनमें सिद्ध शबरपा का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
इनकी सबसे बड़ी विशेषता इनकी विषय-वस्तु और शैली में निहित है। विषय के रूप में, चर्यापदों में सिद्धों की आंतरिक अनुभूतियों और रहस्य भावना का वर्णन मिलता है। ये पद जातिभेद, बाह्याडंबरों और कर्मकांडों की आलोचना करते हुए सहज जीवन और महामुद्रा (परम आनंद) की प्राप्ति पर बल देते हैं। इनका मानना था कि मुक्ति कहीं बाहर नहीं, बल्कि देह के भीतर ही निहित है। इन पदों में साधना के गूढ़ रहस्यों, जैसे शून्य समाधि, की अभिव्यक्ति की गई है।
शैली की दृष्टि से, चर्यापदों को ‘संध्या भाषा’ में रचा गया है, जो इसकी सबसे विशिष्ट पहचान है। संध्या भाषा एक ऐसी गूढ़ और प्रतीकात्मक शैली है, जो एक साथ दो अर्थ प्रकट करती है: एक बाहरी, सामान्य अर्थ और दूसरा साधना से संबंधित रहस्यमय अर्थ। उदाहरण के लिए, वे गंगा-यमुना के बीच नाव चलाने जैसे लोक-जीवन के बिंबों का उपयोग अपनी कुंडलिनी जागरण जैसी योगिक क्रियाओं को समझाने के लिए करते थे। इनकी भाषा तत्कालीन पूर्वी अपभ्रंश और पुरानी हिंदी के काफी करीब थी, जो इन्हें लोक-जीवन से जोड़ती थी। चर्यापद ही आगे चलकर कबीर जैसे संतों की उलटबाँसियों की परंपरा का आधार बने, इसलिए हिंदी साहित्य के विकास में इनका योगदान अत्यंत मौलिक और ऐतिहासिक है।
0 प्रतिक्रियाएँ
