एक थरथराता बूढ़ा है
जिसकी चारपाई के पास
तसले में आग धरी है
राख में उसे मृत्यु दिखायी देती है।
सवेरे की आँखों से अदृश्य
स्वयं को देखता बबूल है
जिसके हर काँटे की नोंक पर
पाले की एक बूँद है
उसकी पुलुई पर बैठा है
सिकुड़ा हुआ बगुला।
नग्न नहाती स्त्री की देह पर से
उठता है वाष्प
धुन्ध में खो जाना चाहती है उसकी नग्नता
किसी अनाम पतली नदी की भाँति
वह गिरना चाहती है
कोहरे के समुद्र में।
टाट का बोरा ओढ़े ऊँघती है
डांगर गाय, जामुन का पेड़ ठिठुरता है
बच्चे नाश्ते की काली चाय में
बासी रोटी भिगोकर खाने के बाद
गली में आये हैं,
अब वे लट्टू नचाएंगे।
0 प्रतिक्रियाएँ
