धान कटने के दिन

ख़ाली ज़ेबों में खनकती हैं
धान की बालियाँ
खेतों में पिघले स्वर्ण की सुगन्ध है
उस पार सवा-साँझ का सूर्य
अशर्फी की भाँति चमक रहा है

खलिहान की धरती पर 
छीली जा है दूब
ओस की बूँदों से मिट गयी है 
मिट्टी की ऊब

तालों में कुमुदिनियाँ खिल रही हैं
पिंडलियों तक पानी में ज्यों 
नवयौवना पिल रही है

सिंघाड़ा अब फलेगा
नहीं खलेगा अन्न का संकट
कातिक के मेलों की धूम है

वधुओं का मान है, दराती की सान है
धान ही धन है, धन्य-धन्य धान है।


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