फूलती कास

कास फूली !

घास के मैदान में
दूर झीलों के किनारे
हार, चारागाह में, 
जैसे कोई आस फूली।

कास फूली !

सुन पवन की सरसराहट 
चकित भौंचक भागते,
फिर हाँफते मृग शावकों की
साँस फूली।

कास फूली !

गात पर धरती के जैसे
फेरती है पोर कोमल
शुभ्र, निर्मल, धवल 
चमकी घाम में अभिराम, ज्यों
कविता में बन अनुप्रास फूली।

कास फूली !


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