जेठ में सावन

बीते हुए कुछ दिन यूं गुजरे
जैसे जेठ की महीने में
मघा नक्षत्र के बादल
झकोर-झकोर कर बरस रहे हैं
मुझे जायसी याद आ रहे हैं
जिन्होंने सालों पहले एक विरहिणी की
विरह-वेदना में कहा था—
बरसै मघा झकोर-झकोरि
मोर दुई नैर चुवै जस ओरि


जिन्होंने नहीं भोगा हो जेठ
वह क्या जाने फगुनाहट क्या होती है
अगर जानना हो तुमको
फगुनाहट का असली रंग
तो देखो
मेरी तरफ नहीं
उस तरफ
जहां
पड़े हुए पैरों के निशान
गांव-खेत-खलिहान में
इसके बाद भी तुम न समझ पाओ तो
चले जाना किसी गांव
जहां‌ लोगों ने बिखेर रखा हो
अपना दुःख
तुम उसे समेटना
भर लेना किसी बोरे में


जब तुम्हें
खराब लगने लगे यह‌ दुनिया
ताना मारे
गाली दे
तुम्हें लगे कि यह दुनिया
अब तुम्हारे लायक नहीं रही


तुम कुछ मत करना
बस‌ पकड़ लेना बेगमपुरा एक्सप्रेस
जो तुम्हें ले जाएगी
दुलारी धिया के पास
उसके पास एक प्रेम-पत्र है
जो लिखा था उसने
अपने होने वाले पति को


उसकी जर्जर झोपड़ी में
सावन भीग रहा है
तुम कुछ मत करना
बस बचाना वह प्रेम-पत्र
दुनिया अपने आप बच जाएगी
तुम्हारे भीतर


तुम पालना छोटी-छोटी इच्छाएं
मत धिक्कारना खुद को
कि बड़ी इच्छाएं—
क्यूं नहीं पाली तुमने
यह छोटी-छोटी इच्छाएं
धीरे-धीरे भरती जाएंगी
तुम्हारे खाली मन को


तुम्हें जब भी लगे
दुनिया बड़ी हो गई
तो तुम लिखना
बच्चों के गीत
जिसमें दर्ज़ हो
उनकी खिलखिलाहट
उनका रोना
जिसे तुम सोना समझना
जो मिट्टी का है
जिसमें बोने हैं तुम्हें
खुशियों के बीज
जब लहालहा उठे खुशियां
तुम झुका लेना अपने कंधे
जिस पर सवार हो जाए कोई बच्चा
रोते-हंसते-खिलखिलाते हुए
उसे दिखाने ले जाना
कोई मेला
यह गुनगुनाते हुए—
गुरु कि करनि गुरु जाएगा
चेला कि करनी चेला
उड़ जाएगा
हंस अकेला


जब तुम्हें लगे कि
मैं बन गया हूं बड़ा कवि
सबकुछ जान लिया है मैंने
तब तुम पढ़ना
मृत्यु का अर्थशास्त्र
फिर लगेगा तुम्हें
पानी कितना गहरा है


दुखों की रागनियां के गीत गाना
जब पड़ जाना अकेले
यह रागिनियां
बनेंगी तुम्हारी सारथी
तुम्हें ले जाएंगी
किसी समुद्र के किनारे
तुम्हारे गीत गाते हुए कि—
भंवरवा के तोहरा संग जाई


तुम्हें जब भी लगे
कुछ खाली हो रहा है
मन और तन से
तुम कुछ मत करना
चले जाना किसी बस्ती में
बतियाना उनका सुख-दुःख
उनकी बात से बात निकालना
फिर एक चमत्कार होगा
तुम्हारी रूकी हुई अंगुलियां
चलने लगेंगी
आसमान में
तुम तारों के गीत लिखना
मनमीत को लिखना
एक ख़त कि—
बहुत हो चुका अंधेरा
अब जुगनुओं की प्रजाति खत्म हो गई है
तुम थोड़ा नीचे आ जाओ
मैं देख पाऊं
उसका चेहरा
जिसने पोत रखी है मेरे मुंह पर कालिख
उसे मैं मिटाना चाहता हूं


याद करना उस कविता को
जब भी विदा होना
धरती के किसी कोने से
तुम रोना
आधी रात में रूलाई का पाठ
रोना आदिम क्रिया है
मनुष्य की
रोते ही बह निकलेगी एक नदी
तुम उसके किनारे चलना
वह तुम्हें ले जाएगी उस पार
जिस पार कुछ नहीं है
है तो सिर्फ एक जुगनू
तुम्हारा इंतज़ार करता हुआ
मिटाने को
धरती का अंधेरा


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