जोकर होना था मुझे

बचपन से साथी ख़्वाब,
आईने से ख़ुद-में झाँक रहा
कोई रंगीन पोशाक,
नाक जो है,
मिरी-ज़िद,   जितनी लम्बी !
आँखें चूहा,  पलकें ग़ायब
ऐसी कि झपकती नहीं,
होंठ पुते लाल, “ओठलाली “
आय हाय ओठलाली, ओये होय,
इतना ख़ुश इतना ख़ुश के हँसे जा रहा
भीने भीने ख़ुद को पिए पिए पिए
इक आह,
जाग का झोंका , नींद ग़ायब
पलकें हैं अब, जो बंद ना हों ??
घुप्प अंधेरा बाहर भीतर,
लम्बी बेचैन रात
साथ! बंद पंखुड़ी सी सो रही पत्नी,
हल्का स्पर्श बालों में, हाथ पीछे कर लिए
उसे जगाऊं बताऊं ?
एक ही तो सपना
वही पूरा न…


4.7 3 votes
रेटिंग
guest
0 प्रतिक्रियाएँ
Inline Feedbacks
View all comments
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x
0

Subtotal